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क्योंकि स्वतंत्रता और समता से अगर इनकार किया जाए तो भाइचारा ही रक्षक बनता है। सहभाव बंधुभाव का ही दूसरा नाम है। और बंधुभाव अथवा मानवता ही धर्म का दूसरा नाम है। कानून अथवा सहभाव का मूल्यांकन करते हुए इस फर्क का पता चलता है क्योंकि कानून धर्मातीत होने के कारण उसे कोई भी भंग कर सकता है। इसके विरुद्ध, सहभाव अथवा धर्म पवित्र होने के कारण उसका सम्मान करना हरेक का कर्तव्य माना जाता है।
यह बिल्कुल न मानें कि मेरा दर्शन किसी आरामतलब व्यक्ति का ध्येय है। सामाजिक जीवन के त्रिगुण सिद्धान्तों को समाप्त कर हिंदु समाज में क्रांति ला सके ऐसा मेरा दर्शन क्रांतिकारी है। इसी कारण मैं इतना आक्रामक हूं और मेरे कई दुश्मन हैं। लेकिन मुझे ऐसे दुश्मन पसंद हैं। क्योंकि, मुझे पता है कि वे मेरी बातें ध्यान से सुनते हैं।
मेरा दर्शन केवल मेरे लिए नहीं है, वह सबके लिए है। अलग शब्दों में कहूं तो मेरे दर्शन काखास उद्देश्य है। मैं लोगों की राय बदलना चाहता हूं। त्रिगुण तत्वों के अनुचरों से उसका त्याग करवाकर मेरे दर्शन को स्वीकृत करवाना चाहता हूं। यह बहुत बड़ा, महती कार्य है और हो सकता है इसमें बहुत अधिक समय लगे।
आज भारतीय लोगों को दो विभिन्न वाद नियंत्रित करते हैं। राज्य संविधान के उद्देश्यपत्र में सूचित किया गया उद्देश्यवाद और धर्म में अंतर्भूत सामाजिक उद्देश्यवाद। समझदार व्यक्ति जान जाएगा कि इन उद्देश्यों में परस्पर विसंगति हैं। राजनीतिक ध्येयवादिता के कारण आजादी, समता और बंधुभाव इन तीन जीवनमूल्यों को मान्यता मिली हुई है। लेकिन प्रचलित सनातनी मानसिकता वाले सामाजिक उद्देश्यवाद के कारण ये तीन तत्व व्यावहारिक जीवन में नकारे गए हैं। इस प्रकार का विसंगतिपूर्ण जीवन कब तक चलेगा? कभी न कभी एक-दूसरे की शरण जाने के अलावा कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। मेरे जीवन-दर्शन में मेरा पूरा भरोसा है और इसीलिए आज अधिकतर भारतीयों का वह राजनीतिक उद्देश्य बना है। कभी वह सबका सामाजिक उद्धेश्यवाद बनेगा ऐसी मैं उम्मीद करता हूं।