504 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
353
मुझे बौद्ध धम्म क्यों प्रिय है?
मुझे जो अल्प समय दिया गया है उसमें मुझे दो सवालों के बारे में विचार करना है - पहला, मुझे बौद्ध धम्म क्यों प्रिय है? और दूसरा, वर्तमान स्थितियों में वह दुनिया के लिए कैसे उपयोगी साबित हो सकता है?
अन्य सभी धर्म ईश्वर, आत्मा, मृत्यु के बाद की स्थिति आदि बातों कीखोज करते हैं जबकि बौद्ध धम्म में इन तीनों तत्वों पर एक साथ विचार किया गया है। अन्य धर्मों में इस प्रकार की बात दिखाई नहीं देती। यह धम्म प्रज्ञा (अंधविश्वास और अलौकिक घटनाओं के विरुद्ध आकलन शक्ति), करुणा (प्रेम) और समता की सीख देता है। मनुष्य को इस धरती पर सुखमय जीवन व्यतीत करने के लिए इसके अलावा और क्या चाहिए? इसीलिए ये तीन सिद्धान्त वाला बौद्ध धम्म मुझे आकर्षित करता है। दुनिया को उबारने का सामर्थ्य न ईश्वर में है और न आत्मा में - ये तीन सिद्धान्त ही दुनिया के उद्धार का सामर्थ्य रखते हैं।
एक और बात यह है कि, दुनिया के -खास कर दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संदर्भ में विशेष रूप में आकृष्ट करने वाली साबित हो सकती है। फिलहाल दुनिया कार्ल मार्क्स और उसके पैदा किए साम्यवाद के तूफान में फंसी है। यह बेहद गंभीर चुनौति है। सभी देशों की धार्मिक व्यवस्था की बुनियाद इसके कारण हिली हुई हैं। इसकी वजह यह है कि, मार्क्सवाद और साम्यवाद नास्तिक बातों से जुड़ा है। आज की धार्मिक व्यवस्था को इसने जो ठेस पहुंचाई है उसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है। आज की धर्मव्यवस्था नास्तिक रचना से अलग नहीं है फिर भी इसी प्रणाली के सहारे हर नास्तिक बात टिकी हुई है। परोक्ष रूप से ही सही जब तक धर्म की मान्यता न हो तब तक निधर्मी रचना का लंबे समय तक टिका रहना संभव नहीं।
दक्षिणपूर्व एशिया के बौद्ध राष्ट्रों की मानसिकता का साम्यवाद की तरफ झुकाव हुआ है। इस बात का मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। मैं मानता हूं कि उन्हें बौद्ध धम्म का
12 मई, 1956 के दिन ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरशन के आकाशवाणी केंद्र से दिए गए भाषण का अनुवाद। मराठी से हिंदी में अनुवाद - संध्या पेडणेकर।