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ठीक से आकलन नहीं हुआ है। मार्क्स और उसके साम्यवाद के लिए परिपूर्ण जवाब बौद्ध धम्म में है यह मेरा पक्का विश्वास है। रशियन तरीके के साम्यवाद ने लहू के रंग में सनी क्रांति को समर्थनीय साधन मान ही लिया है। साम्यवादी प्रणाली को लागू करने के लिए आतुर लोगों को शायद यह पता ही नहीं है कि बौद्ध धम्म का ‘संघ’ एक साम्यवादी संगठन ही है। इसमें निजी सम्पत्ति का कोई स्थान नहीं औरखास बात यह कि यह परिवर्तन हिंसा की उपज नहीं है। मानसिक भी नहीं है। मानसिक परिवर्तन से आया यह बदलाव पिछले 2500 सालों से टिका हुआ है। इस दीर्घ कालावधि में कुछ बदलाव हुए हों शायद लेकिन उसमें स्थित आदर्श आज भी अनिवार्यतः दिखाई देते हैं। रशियन साम्यवाद को इन सवालों के जवाब देने होंगे।
उन्हें और दो सवालों के जवाब देने होंगे। पहला सवाल, क्या साम्यवादी रचना हमेशा रहना जरूरी है? रशियनों के लिए जो काम करना वैसे संभव नहीं था वे काम साम्यवाद के कारण पूरे हुए यह बात मैं मानता हूं, लेकिन उन कामों के पूरे होने के बाद वहां के लोगों को बुद्ध द्वारा उपदेशित प्रेम के साथ आजादी क्यों नहीं मिलनी चाहिए? वह नहीं मिल रही यह देख कर दक्षिण-पूर्वी एशियाई लोगों को सावधान होना चाहिए। रशियन साम्यवाद के जाल में फंसे नहीं। अन्यथा वे कभी भी उस जाल से निकल नहीं पाएंगे। बुद्ध की शिक्षा को वे अपनाएं और उसे राजनीतिक रचना में सम्मिलित करें। दरिद्रता पहले भी थी और आगे भी रहेगी। इसलिए दरिद्रता की वजह को आगे कर मानव की आजादी की बलि चढ़ाना सही नहीं होगा।
दुर्भाग्य की बात यह है कि बुद्ध की शिक्षा का सही अर्थ लगाना या उसके आकलन होने की बात अब तक ठीक तरह से हुई ही नहीं है। उनके सिद्धांत और सामाजिक पुनर्रचना के बारे में गलतफहमियां फैली हैं। बौद्ध धम्म एक सामाजिक सिद्धांत प्रणाली है इसका पता सबको चलने के बाद ही उसका पुनरुत्थान शाश्वत साबित होगा क्योंकि, सबको आकर्षित करने वाली या प्रभावित करने वाली कोई महानता इस धम्म में है यह बात तब पूरी दुनिया को पता रहेगी।
(हस्ताक्षर)
(बी. आर. आंबेडकर)
26, अलीपुर रोड,
नई दिल्ली
दिनांक 12 मई, 1956