354 20-5-1956 भारतीय प्रजातंत्र का भविष्य क्या है - नई दिल्ली - Page 526

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भारतीय समाज जाति व्यवस्था के कीचड़ में इस कदर फंसा है कि यहां हर बात जाति के आधार से ही की जाती है। भारतीय समाज में प्रवेश के साथ ही आपको जातिव्यवस्था का ऊग्र स्वरूप दिखाई दे सकता है। भारतीय मनुष्य किसी भी अन्य व्यक्ति के सात अन्न ग्रहण नहीं कर सकता अथवा विवाह नहीं कर सकता। इसका एक मात्र कारण होता है कि वह व्यक्ति उसकी जाति का नहीं है। एक भारतीय दूसरे भारतीय को स्पर्श भी नहीं कर सकता क्योंकि वह उसकी जाति से संबंधित नहीं होता । राजनीति में भी जाति व्यवस्था का प्रतिबिंब आपको दिखाई देगा। भारतीय मनुष्य चुनावों में किस आधार से मतदान करता है? वह किसी और को अपना मत नहीं देता, केवल अपनी जाति के उम्मीदवार को ही अपना मत देता है। अन्य सभी पार्टियों की तरह काँग्रेस भी चुनाव जीतने के लिए जातिव्यवस्था का दुरुपयोग करती है। सामाजिक रचना की पृष्ठभूमि पर चुनाव क्षेत्रों के उम्मीदवारों की फेहरिस्त जांचिए। आपको दिखाई देगा कि विशिष्ट चुनाव क्षेत्र में बहुमत वाले जाति के व्यक्ति को ही उम्मीदवारी दी जाती है। जातिव्यवस्था की

खुले आम पक्षधर काँग्रेस पार्टी भी इसी व्यवस्था को बढ़ावा देती है।

औद्योगिक क्षेत्र में क्या दिखाई देता है? जो विशिष्ट व्यक्ति किसी उद्योग का मालिक होता है उसी की जाति के लोगों की उस उद्योग के उच्च वेतन लेने वाले अधिकारियों के पदों पर नियुक्ति होती है। अन्य लोग कम वेतन के निम्न पदों पर जिंदगी भर झूलते रहते हैं। व्यापार के क्षेत्र में भी यही तस्वीर दिखाई देगी। पूरे व्यापारसमूह पर एक ही जाति का नियंत्रण होता है और उसके दरवाजे पर पट्टी लटकी होती है कि किसी भी अन्य जाति के लोगों को प्रवेश नहीं है।

दान-धर्म के क्षेत्र पर एक नजर डालें। एकाध कोई अपवाद अगर छोड़ दें तो भारत में दान-धर्म भी जाति के आधार से ही किया जाता है। पारसी व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद अपनी सारी संपत्ति पारसी लोगों के नाम ही करेगा। जैन व्यक्ति की मृत्यु होती है तो वह अपनी सारी संपत्ति जैनियों के लिए ही आरक्षित रखेगा। मृत्यु के बाद मारवाड़ी अपनी संपत्ति मारवाड़ी समाज के लिए ही आरक्षित कर रखता है। ब्राह्मण की मृत्यु के बाद वह अपनी सारी संपत्ति ब्राह्मण के नाम ही रखता है। इस प्रकार राजनीति, उद्योग, वाणिज्य और शिक्षा किसी भी क्षेत्र में पिछड़ी जाति के लिए प्रवेश नहीं है।

जाति व्यवस्था की कुछ और भीखासियतें हैं। उनका बुरा असर होता है और प्रजातंत्र के लिए वह प्रतिकूल साबित होते हैं। जाति व्यवस्था की एकखासियत है श्रेणीबद्ध विषमता। जातियों का दर्जा समान नहीं होता है। वे एक-दूसरे के ऊपरखड़ी होती हैं। एक-दूसरे से उन्हें द्वेष होता है। नीचे से ऊपर की तरफ उनमें द्वेष होता है और ऊपर से नीचे की तरफ उनमें तिरस्कार और तुच्छता की भावना होती है। जातिव्यवस्था की इस

खासियत के कारण होने वाले सबसे घातक परिणामों में हम परस्पर सहयोग की भावना और इच्छा को ही नेस्तनाबूत करना जोड़ सकते हैं।