354 20-5-1956 भारतीय प्रजातंत्र का भविष्य क्या है - नई दिल्ली - Page 527

508 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वास्तव में जाति और वर्ग में भिन्नता यह है कि जातिव्यवस्था की तरह वर्गव्यवस्था में पूर्ण बहिष्कार नहीं होता। जातिव्यवस्था का दूसरा बददिमाग परिणाम है विषमता। वास्तव में दिखाई देता है कि दो जातियों के बीच की आक्रोश और प्रतिक्रियाएं एकांगी होती हैं। उच्च जाति के लोग विशिष्ट तरीके से पेश आएं और निम्न जाति के लोग तय ढंग से ही प्रतिक्रिया दें। मतलब कि, विभिन्न जातियों को प्रोत्साहन की और उसके अनुरूप प्रतिक्रिया व्यक्त करने के समान मौके उपलब्ध न होने के कारण परिणामस्वरूप उनमें से कुछ को मालिक बनने की शिक्षा मिलती है और कुछ को गुलाम। जीवन के विभिन्न अनुभवों के मुक्त आदान-प्रदान को प्रतिबंधित किए जाने के कारण हर घटक अपने प्राकृतिक अधिकारों से वंचित रह जाता है। सो विशेषाधिकार वाले और प्राकृतिक अधिकार छीन गए लोगों के दो वर्ग समाज में पैदा होते हैं। इस प्रकार का विभाजन सामाजिक आदान-प्रदान ( Social Endosmosis ) को प्रतिबंधित करता है।

जातिव्यवस्था की तीसरीखासियत के साथ जुड़ी बुरी बात यह है कि वह प्रजातंत्र की जड़ें हीखोद देती है। हर जाति एक विशिष्ट व्यवसाय से बंधी होती है। हर व्यक्ति अगर औरों के लिए उपयोगी साबित होने वाली और अपने पसंद के व्यवसाय का अगर चुनाव करता हो तो निश्चित रूप से समाज संगठित रूप से स्थिर रहेगा। इस प्रकार पसंद-नापसंद का पता लगाना और समाजोन्नति के लिए उन्हें तैयार करना समाज का कर्तव्य है। लेकिन हर व्यक्ति में क्षमता और क्रियाशीलता की असीमित विभिन्नता होती हैं जो व्यक्ति को बनाती हैं। प्रजातांत्रिक समाज में व्यक्ति की सभी क्षमताओं के लिए

खुली राह उपलब्ध करानी चाहिए। वर्गीकरण व्यक्ति के विकास की राह रोकता है और उद्देश्यपूर्ण तरीके से व्यक्ति के विकास की राह में रुकावटें पैदा करना प्रजातंत्र को जानबूझ कर नकारारना है।

जातिव्यवस्था कैसेखत्म की जा सकती है? इस मार्ग की पहली रुकावट है - जो जातिव्यवस्था का प्राण है - श्रेणीबद्ध विषमता। लोग जब उच्च और निम्न इन दो वर्गों में ही बंटे होते हैं तब उच्च वर्ग के साथ संघर्ष करने के लिए निम्न वर्ग का संगठित होना आसान होता है। लेकिन यहां निम्न जाति का एक ही वर्ग नहीं है यहां निम्न और अति निम्नों का वर्ग है। निम्न कभी अति निम्नों के साथ संगठित नहीं हो सकते। निम्नों को डर होता है कि अगर अति निम्नों का वर्ग स्तर ऊंचा करने में अगर सफल हुआ तो उसे और उसकी जाति को समाज में अपना स्थान गंवाना पड़ेगा।

इस मार्ग में दूसरी रुकावट यह है कि अपना सामाजिक हित किस बात में है इसे न पहचानने के कारण एक साथ कृति करते समय भारतीय समाज पंगु हो जाता है। प्लेटो के कहे अनुसार आखिर सामाजिक संगठन अंतिमतः जीवित साध्य के अहसासों पर निर्भर करता है। अगर हम अपने साध्य के बारे में नहीं जानते, अपना हित किसमें है इसके बारे में अगर हमें पता नहीं है तो सभी बातों के लिए आकस्मकिता और मन