36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ऐसा नहीं कि हमारे सत्याग्रह की कोई समझ न आने वाली, बहुत बड़ी और गहरी वजह है। तीसरी पास बच्चा भी इसका मतलब समझ सकता है, इतना सब कुछ आसान है। लेकिन मुंबई प्रांत के मुख्य मंत्री मि. वेर ने कहा है कि उन्हें इसका मतलब समझ नहीं आ रहा। वैसे, पागलपन का ऐसा स्वांग भरने की कोई जरूरत नहीं है।
बाप मरते समय अपनी संपत्ति किसे मिलनी चाहिए इस बारे में वसीयत लिखता है। अंग्रेजों ने घोषणा की है कि वे इस देश को छोड़ कर जा रहे हैं। मरने वाले बाप की तरह ही उन्होंने भी अपनी वसीयत लिखी है। अपने पीछे अपनी संपत्ति का वारिस कौन होगा इस बारे में बाप जैसे निर्णय करता है उसी प्रकार अंग्रेजों ने भी इस देश के वारिस का फैसला कर लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि, इस देश के असली वारिस होंगे दो- हिंदू और मुसलमान। अस्पृश्यों का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया।
हमें लगा था कि इस देश का पुश्तैनी हक जब तय किया जा रहा है तो अस्पृश्यों को भी कुछ मिलेगा। हमें लगा था कि हिंदुओं को अगर अठन्नी मिलेगी तो हमें कम से कम चवन्नी (पावली) तो जरूर मिलेगा। लेकिन छलकपटी और बेहद चालाक अंग्रेजों ने अस्पृश्य समाज को धोखा दिया।
हिंदू और मुसलमान सत्ता के वारिस बन चुके हैं। सत्ता का हक हिंदुओं को मिला है। हमारा उनसे सीधा सवाल है कि, मिली हुई सत्ता में हमारा हिस्सा कितना है? मि. खेर का कहना है कि यह सीधा-सादा और जायज सवाल उनकी समझ में नहीं आ रहा, उनका न समझना केवल एक ढोंग है। इस तरह अनजान बनने से कुछ हासिल नहीं होगा। इस देश में सुखपूर्वक राज करना हो तो हिंदुओं को हमारे सवाल का जवाब देना ही होगा। अब तक हिंदुओं ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया है। इसी कारण हिंदुओं से हमारा झगड़ा है। अंग्रेजों से झगड़ने में कोई फायदा नहीं। मरे हुए बाप से पुश्तैनी अधिकार के लिए लड़ने में कहां की समझदारी है?
हमारी लड़ाई मुसलमानों के साथ नहीं है, क्योंकि वे हमारा विरोध नहीं करते। मुसलमान बहुल प्रान्तों में हमारी मांगें पूरी करने के लिए वे तैयार हैं।
लेकिन काँग्रेस को, हमारे हकों के बारे में सार्वजनिक घोषणा करनी होगी। केवल
खोखली बातों से अब काम नहीं चलेगा। हमारी मांगों के संदर्भ में काँग्रेस को तुरंत श्भेतपत्र जारी करना होगा। इसके अभाव में अगर ऐसा नहीं हुआ तो, पुणे में शुरू हुए सत्याग्रह की ज्वाला पूरे देश में फैलने में समय नहीं लगेगा। हमारी मांगों की पूर्ति के लिए सभी प्रांतों में हमें लड़ाई छेड़नी पड़ेगी।
आज की हमारी लड़ाई अहिंसात्मक है। हमने अहिंसा का प्रभावी अÐ धारण किया है। अहिंसा के बारे में गांधी की अपनी एक व्याख्या है, लेकिन मेरी व्याख्या गांधी की व्याख्या से पूरी तरह अलग है। तुकारामबुवा की जो थी वही अहिंसा की व्याख्या मेरी भी है।