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तुकाराम की व्याख्या के अनुसार -(मराठी भाषा में है ( दया तिचे नाव, भूतांचे पाळण। आणिक निर्दाळण कंटकांचे। ) यानी, प्राणियों पर दया जरूर करें लेकिन दुष्टों का दमन भी करें। मुझे भी यही सही लगता है। इस व्याख्या का अनुसरण करते हुए हम अहिंसक सत्याग्रह करेंगे ही साथ ही कंटकों का खात्मा भी करेंगे।
हमारे सत्याग्रह का आज भले उन पर कोई असर नहीं हुआ हो, लेकिन कुछ समय के बाद उनकी गर्दन हमारे सामने झुकने ही वाली है। अलग चुनाव क्षेत्र की हमारी मांग उन्हें माननी ही पड़ेगी।
हमारी अलग चुनाव क्षेत्र की मांग काँग्रेस के मन में डर का हौवा पैदा करती है। हमें अलग चुनाव क्षेत्र मिलने से देश का बड़ा नुकसान होगा ऐसा उन्हें लगता है। लेकिन उन्हें इस प्रकार डरने की कोई जरूरत नहीं है। अलग चुनाव क्षेत्र से किसी का नुकसान नहीं होने वाला है। सिक्खों को अलग चुनाव क्षेत्र दिया गया है और इसके कारण देश दो फाड़ नहीं हुआ है।
1934 तक जिन्ना काँग्रेस में थे। वे जब काँग्रेस में थे तब काँग्रेसी उनकी भगवान की तरह पूजा किया करते थे। उनकी देशभक्ति के स्मारक के तौर पर काँग्रेस ने मुंबई में ‘जिन्ना हॉल’ के नाम से एक इमारत खड़ी की थी। यही जिन्ना अलग चुनाव क्षेत्र से ही हमेशा चुनाव जीतते आए हैं यह कोई ना भूलें। जिन्ना के अलग चुनाव क्षेत्र के कारण अगर देश का कोई नुकसान नहीं हुआ तो अस्पृश्यों को अलग चुनाव क्षेत्र देने से देश का बड़ा नुकसान होगा कहने का कोई अर्थ नहीं। मैं पिछले 20 सालों से इस देश की राजनीति में हूं। इन 20 सालों में देश के लिए नुकसानदेह साबित हो ऐसा कोई कार्य मैंने नहीं किया। मेरे मित्र गोवले को इस बात का पता है। मि. गोखले मुझे अपना दोस्त मानते हैं कि नहीं पता नहीं लेकिन मैं उन्हें अपना दोस्त मानता हूं। (हंसी) वाइसराय की कौंसिल में अंग्रेजों को जोर देकर सवाल पूछने वाला अकेला मैं ही था। इन लोगों ने असली अंग्रेज को देखा नहीं होगा। देखा तो वे बौखला जाएंगे।
हमारी लड़ाई हमेशा सिद्धांतों के लिए होती है। हमारा झगड़ा 6 करोड़ अस्पृश्य जनता की ओर से है। हमें राजनीतिक सुरक्षा चाहिए। मुर्खों के कारण अथवा धूर्तों के कारण हमारा कोई नुकसान न हो इस प्रकार उस सुरक्षा का स्वरूप होना चाहिए। हमारे आंदोलन में मूर्खों के लिए तथा धूर्तों के लिए कोई स्थान नहीं। हम ऐसा आंदोलन खड़ा करना चाहते हैं जिसमें लुच्चों-लफंगों के लिए कोई जगह नहीं होगी। अन्य लोगों की तरह हमें भी आजादी चाहिए। हमें किसी की भी - विदेशियों की अथवा स्वदेशियों की गुलामी नहीं करनी। हमें आजादी चाहिए। लेकिन उसी के साथ हमें प्रजातंत्र भी चाहिए। सत्ता अगर कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ गई तो इसका कोई भरोसा नहीं कि हमारे अच्छे दिन आएंगे। यह हमारा डर है और यह डर साधार होने के कारण ही लगता है कि सत्ता आम आदमी के हाथ आनी चाहिए। हमारी पक्की धारणा है कि राजनीतिक सत्ता असल