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की टिकट पर इस प्रांत में जिन 15 लोगों को इस बार चुना गया है उनसे मैं पूछना चाहता हूं कि उन्होंने अपने जीवन के कितने घंटे इस समाज के लिए और इस देश के विकास के लिए लगाए हैं? अस्पृश्यों की उन्नति के लिए जिन्होंने पूरी ताकत लगाकर कोशिशें कीं उन्हें जगह दिए बिना किसी अलग व्यक्तियों को ही विधायक बनाया गया है। गरीबों का राज आए, प्रजातंत्र का शासन हो और अगर काँग्रेस की इच्छा हो तो पिछले 2000 सालों से, जिन्हें हमेशा दबाया गया उन 6-7 करोड़ अस्पृश्यों को उनके उचित व अत्यावश्यक हक मिलने चाहिए।
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हक के लिए हमारी लड़ाई जारी रहेगी
पुणे, दिनांक 5 अगस्त, 1946
अस्पृश्यों के नेता डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने नई अस्थाई सरकार के बारे में कहा कि, नई अस्थायी सरकार बनाते समय काँग्रेस ने अस्पृश्यों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया है उस पर गौर करें तो पता चलेगा कि नई अस्थायी सरकार को अस्पृश्यों के फेडरेशन की मान्यता नहीं मिलेगी। अस्पृश्य इस सरकार को मानेंगे या इस सरकार के प्रति आज्ञाकारी रहेंगे ऐसी आशा काँग्रेस नहीं रख सकती।
आगे उन्होंने कहा-
‘‘अस्थाई सरकार से अस्पृश्यों का नामोनिशान मिटाने को लेकर काँग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच मानो कोई अलिखित करार हुआ है।’’
पाकिस्तान की मांग हो सकती है कुछ अर्थपूर्ण हो सकती है। लेकिन सवर्ण हिंदुओं की बराबरी में मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने में कोई तुक नहीं। और, सभी अल्पसंख्यक जमातों को मिला कर कुल चार जगहें दिए जाने का समर्थन भी नहीं किया जा सकता। अनुसूचितों की संख्या मुसलमान समाज की संख्या की तुलना में आधी से अधिक है। इसलिए मुसलमानों को जितनी दी गई हैं उससे आधी संख्या में जगहें अनुसूचितों को क्यों नहीं मिल रहीं?
पिछले साल शिमला में हुई बातचीत में अनुसूचितों को दो जगहें देने की बात काँग्रेस ने स्वीकार की थी। इस आधार पर कहा जा सकता है कि काँग्रेस ने अनुसूचितों के साथ अब अन्याय किया है। इसीलिए, काँग्रेस को उनसे राजनिष्ठा की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।
इन सभी अन्यायों से बढ़कर बात यह कि काँग्रेस ने श्री जगजीवन राम को अनुसूचितों
गरुड़, 1 सितंबर, 1946