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1946 । संविधान सभा का कामकाज शुरू होने के बाद वह 9वां दिन था जब डॉ. अम्बेडकर ने पहली बार भाषण दिया। भाषण देने के लिए वह जब उठे तो कइयों को लगा कि डॉ. जयकर की तरह ही डॉ. अम्बेडकर भी सभागृह के गुस्से का शिकार बनेंगे। लेकिन ठीक इसके उल्टा हुआ। इस प्रसंग का वर्णन करते हुए सभा के एक सदस्य और प्रत्यक्षदर्शी न. वि. गाडगील कहते हैं, ‘उनका वक्त्व्य एक मंजे हुए राजनीतिज्ञ की तरह था। उसमें कटुता बिल्कुल नहीं थी। ईमानदारी के साथ वह आह्वान कर रहे थे और पूरा सभा गृह मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था।’ सभी सदस्यों ने बहुत ही उत्साह के साथ उनके भाषण का स्वागत किया। सभागृह की लॉबी में सभी ने उन्हें बधाई देने के लिए घेर लिया। ख्1,
इस प्रसंग का वर्णन करते हुए डॉ. अम्बेडकर की कार्यवाही लिखने वाले श्री धनंजय कीर लिखते हैं - बडे सिर वाली, मजबूत ठुड्डी, लंबा गोलाकार-गंभीर और तेजस्वी चेहरे वाले तथा बेहतरीन पोषाक पहने एक मजबूत व्यक्तित्व जयकर की जानकारी को समर्थन देने के लिए खड़ा रहा। वह व्यक्तित्व था डॉ. भीमराव आंबेडकर। काँग्रेस के कट्टर विरोधी। काँग्रेस के तौर-तरीकों और नेताओं की उन्होंने कई बार खुले आम और निजी बातचीत में खि८ी उड़ाई थी। सहज ही संविधान सभा के सभी सदस्यों की नजरें उन पर टिकीं। सभी सदस्यों पर एक बार डॉ. अम्बेडकर ने अपनी नजरें घुमाईं। हर सदस्य को लगा कि जयकर के प्रस्ताव का समर्थन कर डॉ. अम्बेडकर अपनी प्रतिष्ठा गंवा बैठेंगे। काँग्रेस के नेता देश के कर्ताधर्ता नेताओं के प्रतीक थे। उनके खिलाफ बोलना यानी अपने लौकिक जीवन का नुकसान करने जैसा था। काँग्रेस के सदस्य अपने कट्टर विरोधी को उसकी जगह दिखाने के लिए आतुर थे ही।
देश के बड़े-बड़े नेता अपने इर्द-गिर्द बैठे हैं इसका डॉ. अम्बेडकर को अहसास था। उनके बारे में उनके विरोधियों ने भी कई बातें सुन रखी थीं, उनका भाषण सुनने का यह पहला ही मौका था। डॉ. अम्बेडकर ने गंभीर स्वर में, पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना भाषण शुरू किया ख्2, ।
उन्होंने कहा -
अध्यक्ष महोदय, इस प्रस्ताव पर बोलने के लिए आपने मुझे आमंत्रित किया इसके लिए मैं दिल से धन्यवाद देता हूं। जो भी हो, आपके इस आमंत्रण से मैं आश्चर्यचकित हुआ हूं यह मुझे मानना ही पड़ेगा। मैं उम्मीद कर रहा था कि मुझसे पहले 20-22 लोग भाषण करने वाले थे सो, अगर मेरी बारी आएगी भी तो वह कल आएगी। आज मैं बिना किसी तैयारी के आया हूं, इसलिए आज के बजाय कल बोलना मुझे ज्यादा अच्छा लगता। इस प्रसंग में अपने विचार पूरी तैयारी के साथ आपके सामने रखना मुझे अच्छा लगता। आपने मुझे दस मिनट बोलने की इजाजत दी है। इतने कम समय में इस प्रस्ताव पर बोल कर मैं इसके साथ कैसे न्याय कर पाऊंगा यह मेरी समझ में नहीं आ रहा। इसके बावजूद इस
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकरः डॉ. धनंजय कीर, पृ. 400.