242 17-12-1946 समय और परिस्थितियों को अनुकूल बनाया जाए तो दुनिया की कोई भी शक्ति इस देश को एक होने से रोक नहीं सकती - नई दिल्ली - Page 61

42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बारे में अपनी राय मैं कम से कम शब्दों में रखने की कोशिश करूंगा।

अध्यक्ष महोदय, कल से जिस प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है उसके स्पष्टतः दो हिस्से हैं- उनमें से एक विवादास्पद है और दूसरा उपयोगी है। प्रस्ताव के 5 से 7वें परिच्छेद तक का हिस्सा उपयोगी है। इन परिच्छेदों में भारत के भविष्यकालीन संविधान के लक्ष्यों को दिखाया गया है। मुझे यहां कहना ही पड़ेगा कि पं. जवाहरलाल नेहरू जैसे समाजवादी द्व ारा तैयार किया गया यह प्रस्ताव भले उपयोगी हो लेकिन बेहद निराशाजनक है। प्रस्ताव के इस हिस्से में उन्होंने जो कुछ शामिल किया है_ मुझे उम्मीद थी कि वे इससे आगे जाकर सोचेंगे। इतिहास के अध्ययनकर्ता के रूप में मैं इस बात का खयाल जरूर रखता कि किसी भी हाल में प्रस्ताव के इस हिस्से में शामिल बातें उसमें जोड़ी ही न जातीं। प्रस्ताव का वह हिस्सा पढ़ते हुए बरबस फ्रांस के सदन द्वारा मानवीय हकों के संदर्भ में उद्घोषित किए गए घोषणा-पत्र की एक धारा याद आती है। वास्तव में 450 सालों के बाद भी मानवीय हकों से संबंधित घोषणा-पत्र और उसमें जोड़ा गया तत्व अपनी मानसिकता का अविभाज्य हिस्सा है ऐसा अगर मैंने कहा तो वह उचित ही होगा। मैं तो कहना चाहूंगा कि दुनिया के किसी भी सुसंस्कृत इलाके में रहने वाले आधुनिक मनुष्य की मानसिकता का वह अविभाज्य हिस्सा बन गया है। कट्टरपंथी विचार रखने वाले तथा सामाजिक संरचना के मामले में पुरातनवादी हमारे देश में इन तत्वों की वैधता को नकारने वाला शायद ही कोई हो। इस प्रस्ताव में उसे दोहराना केवल अपने पंडित होने का प्रदर्शन करना भर है। ये सिद्धांत हमारे स्पष्ट नजरिए का हिस्सा बने हुए हैं। इसलिए, हमारे लक्ष्यों के रूप में उनकी घोषणा करना अनावश्यक हो जाता है। इस प्रस्ताव में कुछ अन्य खामियां भी हैं। मैं देख रहा हूं कि प्रस्ताव के इस हिस्से में कुछ अधिकारों के बारे में व्यवस्था को साफ-साफ बताया है लेकिन उन्हें हासिल करने के उपायों का या किसी योजना का उसमें जिक्र नहीं है। आप जानते हैं कि लोगों के हक जब छिन जाते हैं तब ऐसी व्यवस्था बेकार ही कही जाएगी जिसमें छीने गए हकों को फिर पाने का कोई प्रबंध न हो। ऐसे उपायों की मुझे इसमें कमी महसूस हो रही है। किसी भी व्यक्ति के प्राण, उसकी आजादी और उसकी संपदा को कानूनी कार्रवाई के बिना छीना नहीं जा सकता यह सर्वमान्य सूत्र भी इस प्रस्ताव में मुझे कहीं दिखाई नहीं देता। कानून और नीति की सीमा के तहत मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है। असल में कानून क्या है और नीति के क्या मायने हैं यह उस वक्त की सरकार ही तय करेगी। तब एक शासनकर्ता एक नजरिया अपनाएगा तो दूसरा कोई और नजरिया अपनाएगा। तत्कालीन शासनकर्ताओं पर अगर यह फैसला छोड़ दिया जाए तो पता नहीं मौलिक अधिकारों की स्थिति क्या बनेगी, यह बताना मुश्किल है। महोदय, प्रस्ताव में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय की व्यवस्था दी गई है। इस प्रस्ताव के पीछे अगर ईमानदारी और वास्तविकता हो - जिसके बारे में मुझे रत्ती भर भी आशंका नहीं है, तो प्रस्ताव प्रस्तुत करने वालों को राज्य जिसके सहारे सामाजिक,