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आर्थिक और राजनीतिक न्याय कर सके ऐसे स्पष्ट उपायों की व्यवस्था करनी चाहिए थी। इस पृष्ठभूमि पर मैं सोच रहा था कि देश में आर्थिक, सामाजिक न्याय की व्यवस्था पर अमल कर पाने के लिए खेती और उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की व्यवस्था प्रस्ताव में होना आवश्यक था। समाजवादी अर्थव्यवस्था के बगैर भविष्य में कोई भी सरकार देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय कैसे कर पाएगी यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही। इसीलिए इन बातों के स्पष्ट जिक्र के लिए मेरा विरोध न होते हुए भी मुझे यह प्रस्ताव थोड़ा निराशाजनक ही लगता है। इस प्रस्ताव के बारे में मेरे मत और जानकारी पेश करने के बाद यह सवाल मैं यहीं छोड़ रहा हूं।
अब मैं प्रस्ताव के पहले हिस्से की ओर मुड़ता हूं। पहले चार परिच्छेदों का इसमें समावेश है। इस सभा में अब तक जो चर्चा हुई है उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि यह हिस्सा विवादास्पद है। प्रस्ताव में प्रयुक्त ‘गणराज्य’ शब्द विवाद का केंद्रबिंदु है ऐसा लगता है। ‘सार्वभौमिकत्व लोगों के बीच से निर्माण होता है’ चौथे परिच्छेद के इस हिस्से के इर्दगिर्द यह विवाद केंद्रित है। मेरे मित्र डॉ. जयकर द्वारा कल उपस्थित किए गए-मुस्लीम लीग की अनुपस्थिति में सभा द्वारा इस प्रस्ताव पर विचार करना सही नहीं होगा- इस मुद्दे पर यह विवाद पैदा हुआ। महोदय, इस महान देश के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक भविष्यकालीन संरचना और उज्ज्वल भविष्य के बारे में मेरे मन में तिलभर भी आशंका नहीं। आज हम राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक नजरिए से विभाजित हैं इसका मुझे अहसास है। एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने वाली छावनियों के समूह हैं हम, बल्कि मैं तो यह भी मानता हूं कि मैं भी ऐसी ही एक छावनी का नेता हूं। महोदय, यह सब भले सही हो, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि समय और स्थितियों को अगर अनुकूल बनाया जाए तो कोई भी शक्ति इस देश को एक होने से रोक नहीं सकती। (तालियों की गड़गड़ाहट) विभिन्न जातियां और संप्रदाय होने के बावजूद हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता। इस बारे में मेरे मन में कोई आशंका नहीं। (हर्षध्वनि) भले आज मुस्लिम लीग भारत को दो फाड़ करने की कोशिश में लगा है, लेकिन एकछत्र भारत ही उनके लिए भी सही होगा। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर चाहें तो मुस्लिम खुद अपने बारे में सोचने लगेंगे।(हर्षध्वनी और तालियों की गड़गड़ाहट)
अंतिम लक्ष्य के बारे में मेरे मत में हममें से किसी को भी डर पालने की जरूरत नहीं है। इस बारे में किसी के मन में कोई आशंका नहीं होनी चाहिए। अपनी दिक्कतें अंतिम लक्ष्य को लेकर नहीं है। आज जो संगठित नहीं हैं उस समाज के लोग एक साथ संगठन के मार्ग पर कैसे आगे बढ़ें इस बारे में सोचना यही हमारी दिक्कत है। हमारी मुश्किल लक्ष्य को लेकर नहीं, शुरुआत कैसे की जाए यह हमारे सामने खड़ी दिक्कत है। अंतिम उद्देश्य को लेकर हमें कोई दुविधा नहीं। इसीलिए अध्यक्ष महोदय, मुझे लगता है कि, अपनी मर्जी से हमारी मित्रता को स्वीकारने के लिए इस देश के हर पक्ष को