46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
थोड़ा दुख पहुंचे। उनकी दलील थी कि क्या ऐसा करने का अधिकार आपके पास है? अपनी बात रखते हुए उन्होंने संविधान सभा के कामकाज से संबंधित कॅबिनेट मिशन के कथन का कुछ हिस्सा पढ़ कर सुनाया। उनकी दलील का मुख्य हिस्सा था, कि इस प्रस्ताव पर निर्णय लेने के लिए संविधान सभा द्वारा जो कार्यपद्धति अपनाई गई है वह कॅबिनेट मिशन के वक्तव्य में समाहित कार्यपद्धति से बिल्कुल अलग है। महोदय, इस मुद्दे को मैं थोड़े अलग तरीके से रखना चाहता हूं। इस मुद्दे को सीधा मंजूर अथवा नामंजूर करने का अधिकार आपको है अथवा नहीं यह मैं आपसे नहीं पूछूंगा। हो सकता है आपके पास यह अधिकार हो। मैं यही पूछना चाहता हूं कि क्या ऐसा करना आपके लिए दूरदर्शी साबित होगा? क्या आपके लिए यह सूझबूझ का निर्णय साबित होगा? अधिकार एक बात है, समझ पूरी तरह से अलग दूसरी बात है। इस बात का निर्णय लेते हुए सदन इस बात पर जरूर गौर करे कि क्या इस प्रकार निर्णय लेना समझदारी होगी? क्या यह कूटनीतिक चतुरता साबित होगी? इस पल यह निर्णय करना क्या दूरदर्शिता साबित होगी? इसका जवाब देते मैं कहना चाहूंगा कि यह दूरदर्शिता या समझदारी भरा कदम सिद्ध नहीं होगा। काँग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच का विवाद मिटाने के लिए एक बार और कोशिश किए जाने का सुझाव मैं देता हूं। यह सवाल जीवन-मृत्यु जितना महत्वपूर्ण है और किसी पक्ष की प्रतिशत के आधार पर उसे कभी सुलझाया नहीं जा सकता इसका मुझे यकीन है। राष्ट्र के भविष्य के बारे में सोचते हुए लोगों की प्रतिशत, नेताओं की प्रतिशत या दल की प्रतिशत नगण्य हो जाती है। किसी भी बात से ज्यादा राष्ट्र का भविष्य महत्वपूर्ण होता है। संविधान सभा का काम सर्व-सहमति से होने के लिए यह लाभप्रद रहेगा। इतना ही नहीं, इससे मुस्लीम लीग द्वारा कोई निर्णय लिए जाने से पूर्व उसकी प्रतिक्रिया भी संविधान सभा को पता चलेगी। इसी कारण मैं डॉ. जयकर की उपसूचना का समर्थन कर रहा हूं। हम अगर जल्दबाजी से निर्णय करेंगे तो भविष्य में उसका क्या असर होगा इस बारे में भी हमें सोचना होगा। सभागृह जिनके बस में है उस काँग्रेस पक्ष की इस बारे में क्या योजनाएं हैं मैं नहीं जानता। इस बारे में वे क्या सोच रहे हैं यह कहने का मेरा अधिकार नहीं है। इस मामले को लेकर उनके क्या दांव-पेंच हैं, उनके पास इस मामले में क्या उपाय हैं मैं नहीं जानता। लेकिन उपस्थित सवाल पर एक तटस्थ व्यक्ति के नाते सोचते हुए मुझे लगता है कि इस बारे में निर्णय लेने के केवल यही तीन उपाय हैं कि, एक दल दूसरे दल की शरण चला जाए, शांतिपूर्ण चर्चा से राह निकाली जाए और तीसरा मार्ग खुलेआम संघर्ष किया जाए। महोदय, संविधान सभा के कुछ सदस्यों से मैं यह सुन रहा हूं कि वे संघर्ष, करने की तैयारी में हैं। मैं मानता हूं कि राष्ट्र के सामने उपस्थित समस्या का हल युद्ध के जरिए ढूंढने की कल्पना देश के किसी व्यक्ति के दिमाग में आए इससे मैं भयभीत हो गया हूं। मैं नहीं जानता कि देश के कितने लोग इस सोच का समर्थन करते हैं। मुझे लगता है इसके कई समर्थक हैं। मुझे लगता है कि, ऐसी कल्पना को बहुसंख्यकों का समर्थन मिलने के पीछे वजह यही होगी कि उन्हें लगता है कि यह युद्ध अंग्रेजों के खिलाफ होगा। लेकिन महोदय, यहां जिस युद्ध के बारे में सोचा जा रहा है क्या उसे केवल स्थानीय, सीमित और केवल अंग्रेजों के