242 17-12-1946 समय और परिस्थितियों को अनुकूल बनाया जाए तो दुनिया की कोई भी शक्ति इस देश को एक होने से रोक नहीं सकती - नई दिल्ली - Page 66

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खिलाफ रखा जा सकता है? अंग्रेजों के अलावा किसी और के साथ लड़ना न हो तो ऐसी योजना के लिए मेरे विरोध की कोई वजह नहीं होगी। लेकिन क्या यह युद्ध केवल अंग्रेजों के खिलाफ होगा? किसी संकोच के बगैर मैं इस सदन को जहां तक संभव हो स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगा कि इस देश में अगर युद्ध हुआ और इस युद्ध का संबंध अगर हमारे सामने उपस्थित समस्याओं के साथ जुड़ा हो तो यह युद्ध अंग्रेजों के खिलाफ नहीं होगा, वह होगा मुस्लिमों के खिलाफ। उससे बुरी बात यह हो सकती है कि यह युद्ध अंग्रेज और मुस्लिमों के संयुक्त मोर्चे के खिलाफ होगा। जिस प्रकार इस युद्ध के होने का मुझे डर है उससे अलग तरीके से यह युद्ध होने की संभावना मुझे नजर नहीं आती। महोदय, अमेरिका के साथ हुई सुलह से पहले बर्क द्वारा दिए गए वक्तव्य का कुछ हिस्सा मैं सदन में पढ़ कर सुनाना चाहता हूं। सदन का माहौल शांत करने में उसका कुछ उपयोग होगा इसका मुझे विश्वास है। आप जानते हैं कि अमेरिका के बागी उपनिवेशों पर कब्जा पाने के लिए अंग्रेजों की कोशिश चल रही थी। उनकी इच्छा के खिलाफ उन्हें अपने वश में करने का अंग्रेजों का इरादा था। तब उपनिवेशों को जीत कर उन्हें वश में करने का विरोध करते हुए बर्क ने कहा था,

‘‘महोदय, मुझे यह कहने की इजाजत दीजिए कि बलप्रयोग का असर केवल तात्कालिक होता है। उसके आधार पर केवल कुछ समय के लिए अधिकार प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्हें हमेशा वश में रखने के लिए फिर से बल का प्रयोग करने की जरूरत को हमेशा के लिए खारिज नहीं किया जा सकता। जिस राष्ट्र को हमेशा अपने अधीन रखना हो उस पर इस प्रकार शासन नहीं चलाया जा सकता।

मेरी दूसरी आपत्ति प्रयोग में लाए जाने वाले बल के परिणामों को लेकर अनिश्चय के बारे में है। जरूरी नहीं कि बल के प्रयोग से हमेशा दहशत ही पैदा हो और तैयार सेना का मतलब जीत नहीं होता। जीत न पाने की स्थिति में फिर कोई मार्ग नहीं बचता। बातचीत असफल हो जाने पर केवल बल प्रयोग का मार्ग ही बचता है। लेकिन तब बल प्रयोग अगर असफल रहे तो बातचीत का कोई जरिया बाकी नहीं बचता। दया के बदले कभी-कभी सत्ता और अधिकार पाए जा सकते हैं लेकिन शक्ति का प्रयोग और पराजित हिंसा से सत्ता और अधिकार भीख में मांगे नहीं जा सकते.....

बल के प्रयोग के लिए मेरा विरोध इसलिए भी है कि हिंसा के कारण कोशिश की पराकाष्ठा से जो आप पाएंगे उसे ही आप हानि पहुंचाएंगे। आप जो पाएंगे वह उसके मूल रूप में नहीं होगा, वह अवमूल्यित, बरबाद और विनाश के रूप में होगा।’’

इन अनमोल शब्दों की ओर ध्यान न देना अनिष्टकारी हो सकता है।

हिंदू-मुस्लिम समस्या अगर बल के प्रयोग से हल करने की किसी की योजना हो तो, साफ शब्दों में कहता हूं कि उन्हें यह ध्यान में रखना होगा कि युद्ध के सहारे मुसलमानों को हरा कर उन्हें संविधान के दायरे में लाना हो तो उनकी सहमति के बगैर बने संविधान की शरण आने के लिए उन्हें बाध्य किया जाए तो इस देश को हमेशा के लिए इन्हीं

  1. मूल अंग्रेजी भाषण का मराठी अनुवाद अतिथि संपादक मंडल और हिंदी अनुवाद संध्या पेडणेकर द्वारा

किया गया है।