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बनानी पड़ती है। अपनी सोच को खास तरीके से ढालना पड़ता है। राजनीति में मनुष्य के लिए प्रचार कार्य करना बहुत जरूरी हो जाता है। लेकिन इसके खिलाफ प्रोफेसर कभी प्रचार कार्य नहीं कर सकता। प्रचारक कभी भी अध्यापक या प्रोफेसर नहीं बन सकता। अब चूंकि मैंने राजनीतिक प्रचारक का पेशा अपनाया है तो मुझे शक है कि मैं किसी विषय पर प्रोफेसर के नाते अपने विचार बेहतर ढंग से पेश कर पाऊंगा। लेकिन मुझे उम्मीद है कि आज का मेरा भाषण प्रचारक के तौर पर नहीं होगा।
मेरी एक आदत है। जिस विषय पर मुझे बोलना होता है उसके सभी पहलुओं के बारे में पहले मैं अच्छी तरह सोच लेता हूं। लेकिन आज मुझे कबूलना पड़ेगा कि इस व्याख्यान से पहले इस प्रकार सोचने के लिए जितने समय की आवश्यकता होती है उतना समय और जितनी मानसिक शांति की जरूरत होती है उतनी मानसिक शांति मुझे नहीं मिली। कई लोग बिना वजह मिलने चले आते हैं और मेरा समय लेते रहते हैं। एक बात मैं पहले ही स्पष्ट करना चाहता हूं कि आजकल के छात्रों से मैं पूरी तरह निराश हूं। कुछ समय तक उनसे मेरे घनिष्ट संबध रहे लेकिन जितना मैं उन्हें समझ सका, मुझे उनमें आस्था की कमी महसूस हुई। हमारे देश में एक समय ऐसा था जब गोखले, तिलक, रानडे, सर फिरोजशाह मेहता जैसे कई और आस्थावान, लगन वाले छात्र पैदा हुए। उनमें आस्था थी, उम्मीद थी, उत्साह था, अनुशासन था। उन्हें अपने ऊपर कुछ जिम्मेदारी है इसका पूरा अहसास था। लेकिन आजकल के छात्रों में यह अहसास या अनुशासन बिल्कुल नहीं है। आज तक मैंने कई छात्रों को पढ़ाया होगा। लेकिन अब कभी रास्ते में उनसे मुलाकात हुई तो वे गर्दन घुमा कर कहीं और का रुख कर लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। आपसी पहचान है यह वे दिखाना तक नहीं चाहते। कई कालेजों में व्याख्यान देने के लिए मुझे आमंत्रित किया जाता है। मैंने अब निश्चय किया है कि उनका आमंत्रण मैं अस्वीकार करूंगा। इसके लिए केवल सिद्धार्थ कॉलेज अपवाद है। सिद्धार्थ कॉलेज अपनी परंपरा को कैसे स्थापित करे यह अब मैं आपको बताता हूं।
अपने कॉलेज का नाम सिद्धार्थ कॉलेज है। यही नाम क्यों रखा गया? नाम देने के बदले में किसी करोड़पति से मैं कुछ लाख रुपया अवश्य ले सकता था। लेकिन मैंने ऐसा सोचा नहीं। अगर मैं किसीसे रुपया लेता तो कॉलेज का नाम उनके नाम पर रखना पड़ता। मैंने इस कॉलेज को सिद्धार्थ कॉलेज नाम देने का निश्चय किया, किसी अमीर से पैसा लेने का ख्याल मन में नहीं आने दिया। आप जानते हैं कि यह बुद्ध का नाम है, बचपन का। अपना यह सिद्धार्थ कॉलेज भी अभी छोटे बालक समान है। अभी उसकी नौ माह तक की उम्र नहीं हुई है। सो, अगर इस कॉलेज ने अब तक अपनी परंपरा को कायम नहीं किया है तो उसमें मुझे आश्चर्य की कोई बात नहीं नजर आती। लेकिन केवल इसी से आप यह अनुमान बिल्कुल न निकालें कि इस कॉलेज के सामने कोई लक्ष्य नहीं है।