244 12-4-1947 आर्थिक लूट रोकने के लिए राष्ट्रीय समाजवाद का अनुसरण करना ही एकमात्र रास्ता है - मुंबई - Page 71

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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आर्थिक लूट रोकने के लिए राष्ट्रीय समाजवाद का अनुसरण करना

ही एकमात्र उपाय है

मुंबई में दिनांक 12 अप्रैल, 1947 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में श्री विष्णुपंत वेलणकर को अलग-अलग संस्थाओं की ओर से सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर वेलणकर ने कहा कि, आज मुंबई में महाराष्ट्रीयन लोग क्लर्की करनेवाले या बोझा उठाने वाले के तौर पर काम करने वाले घाटी ही दिखाई देंगे। इस बुरी तस्वीर को बदलने के लिए महाराष्ट्र को कोशिश करनी चाहिए। पैसे से ही सब बातें होती हैं। आज महाराष्ट्र का सम्मान नहीं है क्योंकि यहां लाव-लाव रुपयों के चेक लिखने वाले नहीं हैं। गांधी का आंदोलन पैसों पर आधारित है। हमारे लोग हजारों की तादाद में फांसी पर चढ़ जाने के बावजूद उनकी कोई पूछ नहीं। सभी बातें ‘लक्ष्मीबाई’ की चमक के आधार पर चल रही हैं। इसलिए, युवकों, लेखनी को व्यापार का साथ दो, रुपया कमाओ, शरीर को मजबूत बनाओ। इन्हीं के सहारे राजनीति में तुम्हें यश मिलेगा। आज के भाषण में आपके लिए मेरा यही संदेश है।

उसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने अपने समापन भाषण में कहा-

विष्णुपंत और मैं पूर्वपरिचित नहीं हैं, उनका संक्षिप्त परिचय मैंने हाल ही में पढ़ा है। उसके आधार पर मुझे दो-तीन बातें शिक्षाप्रद लगीं। पहली महत्वपूर्ण बात यह कि, शिक्षा में अपेक्षित सफलता न मिलने के बावजूद वह कभी निराश नहीं हुए, उन्होंने अपने लिए दूसरा कार्यक्षेत्र चुना। उसमें यश प्राप्त किया। दूसरी बात, उद्योग जगत् में उनका स्थान। रुपया न हो तो व्यक्ति की आजादी, समाज की आजादी, देश की आजादी जैसे शब्द कोई मायने नहीं रखते। अमेरिका इतना बलवान क्यों है? पैसों के कारण ही आज इंग्लैंड अमेरिका की मर्जी के अनुसार चलने लगा है। क्यों? इसलिए कि उसके पास पैसा नहीं है। अमेरिका से उसे पैसे मांगने पड़ते हैं।

हालांकि, विष्णुपंत के इस मत से मैं सहमत नहीं हूं कि पैसा कमाने के लिए ब्रह्मचर्य की जरूरत होती है। यह अगर सही होता तो कहना पड़ता कि सभी मारवाड़ी और गुजराती ब्रह्मचारी हैं! एक हाथ से खाते हुए वे दूसरे हाथ से कमाते दिखाई देते हैं। उनके पास न विद्या है, न कला। लेकिन अपने और अपनी सात पीढि़यों के कल्याण के लिए वे अर्थसंचय करते हैं।

छोटे उद्योगों के सहारे महाराष्ट्रीयन लोगों का कल्याण नहीं हो सकता। बड़े उद्योग वे शुरू नहीं कर सकते। अन्य प्रांतों तथा विदेशियों द्वारा हो रही लूट को रोकने के लिए राष्ट्रीय समाजवाद को स्वीकारने का एक ही मार्ग आज देश के सामने उपलब्ध है।

गरुड़ः 20 अप्रैल, 1946