53
245
प्रोफेसर अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान कामों के लिए ही
समर्पित रहें
भाषण की तारीख न दिए जाने के कारण नवयुग के अंक की तारीख के अनुसार स्थान दिया है।
-संपादक
मुंबई के सेंट झेवियर्स कॉलेज के पुरातत्व अनुसंधान और पुराण-इतिहास इस विषय के विद्वान प्रोफेसर रेव्हरंड फादर हेरास का सिद्धार्थ कॉलेज में महें-जो-दारो (मोहन जोदड़ो) के लेवों का पठन विषय पर भाषण हुआ। उस दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने प्रोफेसरों के अनुसंधान कार्य के बारे में विवेचन किया। उन्होंने कहा-
फादर हेरास ने अपार मेहनत से महें-जो-दारो में मिले सिक्कों और ईंटों पर की लिखावट कैसे पढ़ी जाए इस विषय पर अध्ययन किया। हर किसी को इस बारे में आनंद, गर्व और आश्चर्य की अनुभूति होगी इसमें दो राय नहीं। मेरे मन में कई सवाल आए कि जिस प्रकार फादर हेरास ने अपना पूरा ध्यान इस विषय पर केंद्रित किया और बेहद महत्वपूर्ण अनुसंधान किया उसी प्रकार का अनुसंधान हमारे हिंदी विषय के प्रोफेसरों ने क्यों नहीं किया? क्या ऐसे विषयों में उनकी रुचि ही नहीं है? या फिर उनके पास इस काम के लिए जरूरी विद्वत्ता नहीं? या कि, साधन सामग्री की कमी है? आज, इन बातों के क्या कारण हो सकते हैं इस पर जरा बारीकी से हम सोचेंगे।
मुझे लगता है कि थोड़े रुपए कमाएं और सुख से जिएं के अलावा हमारे प्रोफेसर्स के मन में और कोई महत्वाकांक्षा ही नहीं है। महत्वाकांक्षा के अभाव में ही उनके हाथों कोई महत्वपूर्ण काम शायद नहीं हो पाता। कभी-कभार वे पाठ्यपुस्तकों पर नोटस् लिखते हैं। नोटस् लिखने के अलावा और कोई महत्वपूर्ण काम हो सकता है इस बारे में पता नहीं वे जानते भी हैं या नहीं!
तभी एक प्रोफेसर ने कहा, ‘हम प्रोफेसर्स आजकल के विश्वविद्यालयों में मिलने वाली शिक्षा की ही उपज हैं। इसीलिए, इस बारे में प्रोफेसरों को नहीं वरना विश्वविद्यालय की शिक्षा पद्धति को ही दोष देना होगा।’
तब डॉक्टर अम्बेडकर ने कहा, ‘मैं मानता हूं कि हमारे विश्वविद्यालयों की शिक्षा
नवयुगः अम्बेडकर विशेषांक, 13 अप्रैल, 1947