245 12-4-1947 प्रोफ्रफेसर अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान के कार्य के लिए समर्पित रहें - मुंबई - Page 73

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पद्धति के कारण श्रेष्ठ प्रोफेसरों का निर्माण कठिन हुआ है। हममें से कई प्रोफेसरों को शेक्सपियर के नाटक या काव्य कॉलेजों में पढ़ाने पड़ते हैं। यह विषय पढ़ाने की शुरुआत जबसे हुई है तबसे हमारी युवा पीढ़ी को या भारत को किस प्रकार फायदा पहुंच रहा है? मुझे लगता है, कोई फायदा नहीं होता। मैं भी कभी-कभी नींद न आए तो शेक्सपियर या काव्य वगैरा पढ़ता हूं। नहीं पढ़ता ऐसी बात नहीं है। लेकिन वह केवल समय काटने के लिए। उस विषय पर मैं सोच नहीं सकता।

हमारे कॉलेजों में आजकल एकदम साधारण स्तर की शिक्षा दी जाती है। मानता हूं कि, बी ए की परीक्षा तक स्कूल के अध्यापक बच्चों को पढ़ाते हैं उसी पद्धति से शिक्षा दी जाती है। ऐसा नहीं कि उसमें हम सुधार नहीं ला सकते। मुंबई शहर में ही आर्टस् और साइंस विषय पढाने वाले छह बड़े-बड़े कॉलेज हैं। आजकल के चलन के अनुसार हर कॉलेज विश्विवद्यालय से जुडा हुआ है लेकिन इसके बावजूद उनका अस्तित्व अलग विद्यालय की तरह ही है, है ना? इससे होता यही है कि इन छहों महाविद्यालयों में अलग-अलग प्रोफेसरों के द्वारा एक ही विषय बार-बार पढ़ाया जाता है। इससे एक ही काम की निरर्थक पुनरावृत्ति होती है। लेकिन, मान लीजिए कि इन विषयों के बजाय अगर हम ऐसा करें कि, एलफिन्स्टन महाविद्यालय में केवल इतिहास और अर्थशास्त्र यही विषय पढ़ाए जाने की व्यवस्था करें और जो प्रोफेसर इन विषयों को पढ़ाना चाहें उन्हें केवल एलफिन्स्टन कॉलेज में ही भेजा जाए तो एक ही विषय के 7-8 प्रोफेसर्स एक जगह मिलेंगे। फिर उनके काम को हम सहज ही विभाजित कर पाएंगे। एक प्रोफेसर ‘प्राचीन भारत’ पर भाषण देंगे। एक अन्य प्रोफेसर- ‘बुद्ध का समय और ईसामसीह युग’ का प्रारंभ विषय पर भाषण देंगे। तीसरे प्रोफेसर ‘मुस्लिम युग’ विषय पर भाषण देंगे। चौथे ‘मराठों का युग’ विषय पर और पांचवें प्रोफेसर ‘अंग्रेजों का युग’ विषय पर भाषण देंगे। इससे विषयों का अच्छा बंटवारा होगा और हर प्रोफेसर को अपने विषय का पूरा अध्ययन करने की फुरसत मिलेगी। इससे हर प्रोफेसर को अपने विषयों पर अनुसंधान करने की तैयारी के लिए ज्यादा समय मिलेगा। मुंबई विश्वविद्यालय में अन्य सुधार होने के इंतजार में बैठे रहने की बजाय पहले हम इस एकदम सादे से सुधार को तुरंत लागू करें। हर कालेज एक-दो विषयों के लिए ही अपने को समर्पित रखे। इससे उस कॉलेज में उस विषय से संबंधित सभी ग्रंथ इकठ्ठा हो पाएंगे। आवश्यक वस्तुओं का संग्रहालय भी पास ही रखने की व्यवस्था भी की जा सकेगी। सभी कॉलेजों के प्रोफेसरों को अलग-अलग तनख्वाह न देते हुए विश्वविद्यालय की ओर से ही सबकी एक-सी तनख्वाह तय की जाए। इससे आज की तरह अलग-अलग न होकर सरकारी कॉलेज और निजी कॉलेज के प्रोफेसरों की तनख्वाह एक-सी होगी। तनख्वाह की समस्या दूर होने तथा काम के उचित बंटवारे के बाद शिक्षा देने का काम और अनुसंधान कार्य तेजी से शुरू होगा।