57
1948 के जून महीने में भारत छोड़ने की अंग्रेजों की घोषणा के कारण हमारी स्थिति और मुश्किल हो गई है। इसका खयाल आते ही इस बात की कल्पना भी नहीं की जाती कि हमारा आगे क्या होगा। स्थितियां ऐसी भी हो सकती हैं कि अंग्रेजों को यहीं रहना पड़े। हमारे संविधान के तहत सुरक्षा की मांग अंग्रेजों की घोषणा के बाद पीछे छूट गई जैसा भले लग रहा हो लेकिन...
हमें अपनी समस्याओं पर ध्यान देने के लिए मजबूर कर अपने राजनीतिक अधिकार लेने में और उन्हें स्थापित करने में हमें जरूर सफलता मिलेगी इस बारे में आप यकीन रखें।
मुझे यह बताने में बहुत खुशी हो रही है कि मौलिक अधिकार नियामक कमेटी में हमें काफी सफलता मिली है। मौलिक अधिकारों के संदर्भ में मेरा बनाया मसौदा कमेटी को प्रस्तुत किया- वह स्वीकार किया गया है। केवल राज्य के कामकाज और नौकरी में श्रेणियां बनाने के सवाल पर थोड़ा विवाद हुआ। श्रेणियों का भेद टालने के कुछ उपाय मैंने सुझाए। उसमें भी मुझे सफलता मिलने के आसार लगते हैं। ऐसा हुआ तो कानून मंडल और कार्यकारी मंडल में हमें खूब सुरक्षा मिलेगी। खेद के साथ मुझे कहना पड़ रहा है कि आम दलित जनता जिससे सहमत नहीं ऐसा मसौदा अल्पसंख्यक उप-कमेटी के दो अस्पृश्य सदस्यों ने प्रस्तुत किया है। उनमें से एक ने मांग की है संयुक्त मतदाता संघ की (शेम शेम की आवाजें) दूसरे ने इससे आगे बढ़ कर संयुक्त मतदाता संघ में विभाजक मतदाता पद्धति की मांग की (फिर शेम शेम की आवाजें)। इस बारे में मुझे उम्मीद है कि उप-कमेटी के अन्य अल्पसंख्यक जमातों का मुझे सहयोग मिलेगा। कमेटी इन समस्याओं का निर्णय बहुमत के आधार पर लेगी या इस मामले पर सुलह की बात चलाएगी इस का मुझे सही अंदाजा नहीं है। लेकिन एक बात तय है कि अगर वे बहुमत के आधार पर निर्णय लेंगे तो संविधान समिति से मैं अपना संबंध तोड़ लूंगा (तालियां।) फिर क्या करना है हम तय करेंगे। राजनीतिक समस्याओं को हल करने के लिए हमें अपना दोगुना कर्तव्य निभाने की जिम्मेदारी निभानी है। पहला अपने लोगों के प्रति और दूसरा अपने देश के प्रति। हम सब चाहते हैं कि हिंदुस्तान आजाद हो। मुझे इस बात का अहसास है कि मंत्री योजना में हमारी उपेक्षा की गई है लेकिन इस कारण हमें देश की आजादी की राह में रोड़े नहीं अटकाने हैं। हिंदुस्तान को सहजता से आजादी पाने की कोशिश करना आसान होना चाहिए। इसी भावना और अहसास के साथ मैंने आज तक कई भाषण किए हैं। लेकिन इसके साथ ही मैं यह भी निश्चयपूर्वक कह सकता हूं कि मुझे पूरा यकीन है कि राजनीतिक अधिकार सुरक्षित करते हुए अगर 6 करोड़ अस्पृश्यों को संरक्षण नहीं दिया गया और अस्पृश्यों की इच्छानुसार रियायतें देने के लिए काँग्रेस ने अपनी रजामंदी नहीं दर्शायी तो संविधान समिति से निकलने के मेरे