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मेरा नाम उस फेहरिस्त में किसी बलबूते शामिल नहीं कर पाएगा, और मुझे यह सम्मान पाने की लालसा नहीं है। एक समय ऐसा था कि मुझे अपने संकोच से छुटकारा पाने की फिक्र हुआ करती थी। मैं इस बात को लेकर इतना निराश था कि छात्र मेरा मजाक उड़ाएंगे यही सोच कर सिडनहॅम कॉलेज में मिली नौकरी छोड़ देने तक की सोची थी। लेकिन मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि जिन्हें मेरी तरह डर सताता हो वे अपना डर त्याग कर भाषा पर प्रभुत्व पाने की कोशिश में लग जाएं। मेरे मतानुसार इसमें कठिन कुछ भी नहीं। इस सभागृह को अगर ढ़ग से चलाना हो तो अध्यक्ष के निर्णय का सम्मान करना शर्त है। अध्यक्ष के निर्णय पर आप किसी तरह की शंका को मन में न लाएं। अगर ऐसा कोई सवाल पैदा होता है और कोई पुराना संदर्भ उपलब्ध न हो तो या फिर तुरंत निर्णय करना अध्यक्ष के लिए असंभव हो तो अध्यक्ष खुद विभिन्न दलों के सदस्यों को उस प्रश्न पर अपने विचार व्यक्त करने और व्यक्त किए गए विचारों की छानबीन कर अर्थ बताने के लिए कहेंगे। किसी निर्णय के बारे में इस प्रकार छानबीन होने के बाद अध्यक्ष जो निर्णय करेंगे उसे आपको अंतिम वाक्य की तरह स्वीकारना होगा भले ही वह गलत क्यों न हो। कुछेक सालों का अपवाद छोड़ दें तो 1926 से लेकर 1946 तक के लगभग सभी सालों में मैंने र्पालमेंटरी कामकाज में हिस्सा लिया है। उस अवधि में हर तरह के अध्यक्ष मैंने देखे। उनमें से कई अच्छे थे, कुछ नहीं, कुछ निष्पक्ष थे, कुछ योग्य थे, कुछ अयोग्य थे, कुछ संतुलित थे और कुछ अन्य गुण और अवगुणों से भरे थे लेकिन हमने उनके निर्णय का हमेशा सम्मान ही किया। असल में यह दुख की बात है कि पार्लियामेंट का काम कैसे चलता है इसका प्रत्यक्ष ज्ञान आपको मिल नहीं पाता। अगर आपको पेरिस, लंदन या अमेरिका जाने और उन जगहों के अधिवेशन देखने का मौका मिले तो इन तीन सभागृहों के मजेदार मतभेदों को देखने का अवसर आपको मिलेगा। आप पाएंगे कि पैरिस का सभागृह आश्चर्य का एक नमूना है। एक बार पैरिस के कनिष्ठ सभागृह में मुझे लगातार दो या तीन दिन जाना पड़ा था। वहां जो कुछ चल रहा था वह देख कर मुझे लगा कि क्रॉफर्ड मार्केट में और उस जगह में कोई फर्क नहीं है। उस सभागृह में लोग बार-बार यहां-वहां आवाजाही कर रहे थे और अनुशासन नाम की कोई चीज वहां नहीं थी। अध्यक्ष की बात कोई नहीं सुन रहा था सभी अनुशासन की अनदेखी कर रहे थे और बिचारे अध्यक्ष महोदय को शांति बनाए रखने के लिए बार-बार अपना हथौड़ा, और इसी काम के लिए बनाया गया लकड़ी का एक टुकडा टेबिल पर मारना पड़ता था। उनकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं था। लेकिन लंदन के सभागृह में इसके बिल्कुल विपरीत तस्वीर आपको दिखाई देगी। वहां एक नियम है कि अध्यक्ष जब खड़े होते हैं तब वहां कोई और अपनी जगह खड़ा नहीं रहेगा। हर सदस्य को बैठे रहना होगा। उसी प्रकार सदन में जब एक व्यक्ति खड़ा हो तब कोई और अपनी जगह खड़ा नहीं रह सकता, हर किसी को बैठे रह कर उसको सुनना है।