251 10-10-1947 अल्पसंख्यकों को मनाना ही चाहिए, अधिकार के नाम पर उन पर अत्याचार न करें - मुंबई - Page 87

68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कॉमन्स सभागृह में अध्यक्ष की अनुमति के बिना कोई सदस्य अपने भाषण की शुरुआत नहीं कर सकता। साथ ही अध्यक्ष पर कोई रोक नहीं होती कि वे फलां व्यक्ति को ही बोलने की इजाजत दें। वहां उनकी भाषा में एक उक्ति कही जाती है कि, ‘‘अपनी नजर में आने वाले व्यक्ति को ही अध्यक्ष बोलने की अनुमति देते हैं।’’ लेकिन इस उक्ति में एक छुपी बात है और उसके अनुसार हो सकता है अध्यक्ष किसी सदस्य की ओर देखें और उस सदस्य को भाषण के लिए आमंत्रित करने के बजाय केवल उसकी ओर देख कर आखें मिचकाएं। इसकी वजह भी साफ है। कई लोगों के साथ-साथ होने से अध्यक्ष हर सदस्य को जानते हैं, उनके अच्छे-बुरे गुणों को जानते हैं। अध्यक्ष को केवल उनके पारिवारिक जीवन के बारे में जानकारी नहीं होती, बाकी सब वह जानते हैं। इसी कारण अध्यक्ष लंबा, ऊबाऊ भाषण देने वालों को या उन सदस्यों को बोलने की अनुमति नहीं देते जिनकी बातों में महत्वपूर्ण मुद्दे नहीं होते।

पार्लिमेंटरी प्रजातंत्र जिसे कहा जा सकता हो ऐसा प्रजातंत्र आज हमारे यहां है। इस शब्द के क्या मायने होते हैं यह हम जानें। तानाशाह शासनप्रणाली और इस प्रकार के प्रजातंत्र का फर्क यही है कि तानाशाह शासनप्रणाली में कानून बनाने वाली सभा अथवा पार्लियामेंट नहीं होता। जनता की इच्छा का वहां कोई सम्मान नहीं होता। राजा अथवा तानाशाह ही सब कुछ होता है। जनता का प्रतिनिधित्व वह अपने पास ही रखता है। अपनी मर्जी के अनुसार वह राज चलाता है। जबरदस्ती अपने आदेश थोपकर जनता को उत्पीडि़त करता है। आज हम मजदूरों की तानाशाही का उदाहरण भी देखते हैं। इन दोनों में वैसे देखा जाए तो कोई फर्क नहीं है। बस इतना ही कि, यहां तानाशाहों ने मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया है। लेकिन यहां भी तानाशाही अथवा किसी राजा की शासन व्यवस्था की तरह ही जनता की इच्छा का कोई स्थान नहीं होता। पार्लिमेंटरी प्रजातंत्र इन दो व्यवस्थाओं का स्वर्णिम संयोजन है। इस संस्था में कोई बुराई प्रवेश न करे इसलिए उसकी अच्छाइयों को मन में स्थान देना होगा। कई राजनीतिक दार्शनिकों ने इसकी अलग-अलग तरीके से व्याख्या की है। उनमें से एक व्याख्या के अनुसार कानून का राज्य अर्थात् पार्लियामेंटरी प्रजातंत्र। किसी समय उसकी यह खासियत मन में जगह बनाने लायक और संकेतात्मक हुआ भी करती थी। यूरोप से जब राजतंत्र हटा और उसकी जगह प्रजातंत्र ने ली तब यह सत्तांतर देखने वाली पीढ़ी को प्रजातंत्र की खासियतें मन में घर करने वाली और सांकेतिक लगी थीं। क्योंकि उससे पहले राजकाज निजी हुआ करता था। राजा अपनी इच्छा के अनुसार कामकाज चलाता और उसके बनाए कानून की सीमा से वह खुद बाहर रहता। कानून से वह श्रेष्ठ माना जाता, क्योंकि कानून जनता के लिए बनाया जाता उसके लिए नहीं। इसलिए कानून के जिस राज्य के हम नागरिक हैं, जिसकी खासियतों का हम लाभ उठाते हैं वह हमारे लिए एक सामान्य-सी बात है और उनसे अब हम इतने परिचित हैं कि उसकी इन खासियतों की ओर कभी हमारा ध्यान