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ही नहीं गया। इसके बावजूद, प्रजातंत्र की खासियत ज्यों की त्यों हैं और वह यह कि, जो कानून बनाते हैं वे भी उसके दायरे में आते हैं।
किसी ने प्रजातंत्र की व्याख्या करते हुए कहा है कि बहुसंख्यकों का शासन यानी प्रजातंत्र। यह बात सही है कि अपने विधानमंडल में बहुसंख्यकों की राय से सभी सवालों के हल निकाले जाते हैं, लेकिन इस बात की ओर आप सावधानी से ही दखें, ऐसी मैं आपको सलाह देना चाहूंगा। क्योंकि यह बड़ी घातक बात है। बहुसंख्यकों की सत्ता का सिद्धांत केवल सहुलियत के हिसाब से ही माना गया है। इन सिद्धांतों को बहुत ज्यादा अहमियत मत दो। क्योंकि उससे कई सारे सिरदर्द पैदा होंगे। कुछ विशेष नजरियों से देखा जाए तो बहुसंख्यकों की सत्ता अन्यायपूर्ण होती है। इस बात को मैं विस्तार से कह सकता हूं। उदाहरण के तौर पर, आजकल हम संविधान बनाने के काम में लगे हुए हैं, मैं अध्यक्ष हूं। अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों को हमें सुरक्षा प्रदान करनी है। इसका मतलब यह कि अल्पसंख्यकों के कुछ मामलों में हस्तक्षेप करने का बहुसंख्यकों को कोई अधिकार नहीं। मौलिक अधिकारों का मतलब यही होता है। बहुसंख्यकों के अधिकारों पर इस प्रकार मौलिक अधिकारों के कारण प्रतिबंध लग जाते हैं। सच बात यह है कि, बहुसंख्यकों की सत्ता का सिद्धांत अनपेक्षित घटी घटना की बात है।
कॉमन्स सभागृह के इतिहास का अगर आप अध्ययन करेंगे तो आपके ध्यान में एक बात आएगी कि 1415 में कॉमन्स सभागृह में एक सूचना दी गई। उस पर विचार करने के लिए अनुकूल और प्रतिकूल राय रखने वाले अलग-अलग कमरों में गए। अध्यक्ष ने क्लर्क से ‘हां’ और ‘नहीं’ कमरे के सदस्यों की संख्या पूछी। क्लर्क जवाब के अनुसार हां वाले कमरे में 50 सदस्य थे और नहीं वाले कमरे में 20 सदस्य थे। इसके बाद अध्यक्ष हां वाले कमरे में गए और वहां सदस्यों से उन्होंने कहा कि वे ना वाले कमरे में जाकर वहां के सदस्यों को मनाएं और सभागृह में ले आएं और उनको जब वे ले आए तभी सूचना के बारे में लिया गया निर्णय बताया। इसका एक खास मतलब यह होता है कि अल्पसंख्यकों की भले मौन सहमति के साथ ही सही लेकिन उनकी सहमति के बगैर अध्यक्ष बहुसंख्यकों की ओर से निर्णय नहीं ले सकते। शुरुआत में इसी प्रकार चला करता था। आगे चल कर किन्हीं वजहों से बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों को मनाए जाने की यह प्रथा खत्म हुई। इसलिए पार्लियामेंटरी प्रजातंत्र में सहूलियत के नजरिए से बहुसंख्यकों की सत्ता के तौर पर इस सिद्धांत को मान्यता भले दी हो, लेकिन उसका मतलब यह नहीं कि उस सिद्धांत के बल पर आप अल्पसंख्यकों पर अन्याय कर सकें या उन पर दबाव डाल सकें। इससे इस सभागृह में कई समस्याएं पैदा होंगी। इसके लिए आप अल्पसंख्यकों को मनाएं। उन पर आप कष्टकारी अधिकार न चलाएं।
वॉल्टर बगेहाट नाम के एक राजनीतिज्ञ दार्शनिक थे। उन्होंने पार्लिमेंटरी प्रजातंत्र की