251 10-10-1947 अल्पसंख्यकों को मनाना ही चाहिए, अधिकार के नाम पर उन पर अत्याचार न करें - मुंबई - Page 89

70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

व्याख्या करते हुए कहा है कि यह बहस करने वाली राज व्यवस्था है। मुझे लगता है कि यही बहुत बड़ा सत्य है। क्योंकि प्रजातंत्र में सब कुछ खुला होता है। परदे के पीछे से कुछ काम नहीं किया जाता। इसी प्रकार केवल एक व्यक्ति की इच्छा है इसलिए कुछ नहीं किया जाता। हर विषय सदन में प्रस्ताव, कानून अथवा सूचना के रूप में रखा जाता है और सदन में उस पर बहस की जाती है।

‘क्लोजर’ की परंपरा वाली पार्लियामेंटरी पद्धति हम लागू नहीं कर पाए यह बड़े

खेद की बात है। इस व्यवस्था में एक बार पार्लियामेंट द्वारा अपने पक्ष के कुछ सदस्यों को 48-36 और 24 घंटों तक बोलने पर मजबूर कर ग्लॅडर्स्टन और लॉर्ड नॉर्थबुक को कैसे मुश्किल में डाला था यह किस्सा सुनाया गया है। इसी कारण क्लोजर पद्धति कैसे अस्तित्व में आयी यह भी बताया।

सभी विधानमंडलों में बहस पूरी करने के बाद सवाल-जवाब के लिए समय रखने का प्रावधान होता है और बहस के लिए भी काफी समय मिलता है। एक बात ध्यान में रखें कि पार्लियामेंट में जो चर्चा होती है उसका उद्देश्य केवल निर्णय लेना ही नहीं होता, उससे अधिक महत्व चर्चा का होता है। कॉमन्स में हुई बहस अगर ऊंचे स्तर की हुई और अगर उस विवाद को व्यवस्थित ढंग से अखबारों में प्रकाशित किया जाए तो उसके जरिए लोगों को राजनीति की शिक्षा पाने का एक अमूल्य अवसर मिलेगा, इसमें कोई शक नहीं और यही उसकी महत्वपूर्ण विशेषता है।

पार्लियामेंटरी पद्धति को स्वसत्ता राज्य पद्धति माना जाता है और यह सच भी है। लेकिन इससे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि इस देश को जिसकी जरूरत है उस सुराज्य का आप कैसे निर्माण कर सकते हैं? यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है और इस बारे में आग्रह से एकाध पहलु को ही छूने वाली कोई बात मैं कहना नहीं चाहता। लेकिन मैं आपके सामने विचार के लिए एक-दो बातें रखना चाहूंगा। मेरी राय के अनुसार सुराज्य क्या होता है? आग्रह के साथ एक ही पहलु की बात करने वाले पक्ष को रखा न जाए। पूंजीवालों को पूंजीवादी राज्य व्यवस्था और खुले व्यापार के सिद्धांत में स्वर्ग दिखाई देगा, सामाजिक सत्तावादियों को समाजवादी पद्धति में सुराज्य व्यवस्था के अधिक गुण दिखाई देंगे। कई विभिन्न राय रखने वाले लोगों को उनकी पसंदीदा शासनप्रणाली सुराज्य के लिए योग्य लगेगी। अर्थात्, वास्तविकता यह है कि सुराज्य के बारे में कई तरह के मत हो सकते हैं। विविध वर्णों का, वंशों का हमारा समाज और इसके कारण पैदा होने वाली कई उलझी हुई विकट समस्याओं के हल ढूंढने के लिए कोई एकमात्र कारगर व्यवस्था का मिल पाना मुश्किल है। इसके लिए अलग-अलग उपायों की योजना करनी होगी। और मुझे लगता है कि, आपको यह बात अच्छी तरह ध्यान में रखनी होगी। अपने देश को इस बुरी स्थिति से मुक्ति दिलाने के लिए किसी एक ही कठोर कार्रवाई को