252 14-1-1948 राजनीति की लगाम शिक्षा के बगैर हाथ नहीं आने वाली - मुंबई - Page 91

72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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राजनीति की लगाम शिक्षा के बगैर हाथ नहीं आनेवाली

बुधवार दिनांक 14 जनवरी, 1948 के दिन मुंबई के धोबीतलाव नाइट स्कूल के छात्रों की भाषण प्रतियोगिता समारोह शाम 8 बजे सिद्धार्थ कॉलेज में हुई। इस समारोह की दो बातें विशेष थीं जो सहज ही प्रकट हो रही थीं। पहली खास बात यह कि अंग्रेजी के ए. बी. सी. अक्षरों का विस्तार कैसे किया जाता है यह सीखने वाले इन छात्रों के इस कार्यक्रम के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर बड़ी आत्मीयता के साथ उपस्थित थे। दूसरी खासियत थी छात्रों में हीनभावना। दरिद्रता के कारण जिन युवकों को बचपन में ही मन मसोसकर स्कूल की सीढि़यां उतर कर मिल-कारखानों की राह पकड़नी पड़ी थी ऐसे 350 युवक अब नौकरी करते करते इस नाइट स्कूल में पढ़ने लगे हैं। इन्ही छात्रों का यह कार्यक्रम था। अध्यक्षता करने पीपल्स एज्युकेशन सोसाइटी के वाइस चेयरमन डी. जी. जाधव को आमंत्रित किया गया था। परीक्षक समिति में आयु. हुदलीकर, आयु. केलसीकर और आयु. भास्करराव भोसले थे। भाषण प्रतियोगिता के लिए तीन विषय दिए गए थे . 1. अस्पृश्य युवकों के कर्तव्य 2. हिंदु धर्म के बारे में मुझे क्या लगता है? 3. फिल्में देखना अच्छा है या बुरा? नौ छात्रों ने इस स्पर्धा में हिस्सा लिया था और पुरस्कार जीते . 1. कु. हाटे 2. कु. कांबले और 3. कु. जाधव ने।

इस अवसर पर नाइट स्कूल के प्रबंधक, वाद-विवाद मंडल के सचिव और समारोह अध्यक्ष के भाषण हुए। उनके बाद तालियों की गड़गड़ाहट के बीच डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपना भाषण शुरू किया। उन्होंने कहा -

प्रिय मित्रों,

आज जो भाषण प्रतियोगिता का कार्यक्रम हुआ और उसमें जिन छात्रों ने हिस्सा लिया उनकी सोच और मेरी सोच में बहुत फर्क है, ऐसा मुझे लगता है। जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था उनका काम उत्सुकता जगाने वाला रहा ऐसा शायद खुद उन्हें भी नहीं लगता होगा। हालांकि, अपना भाषण अच्छा नहीं हुआ इसमें निराश होने जैसी कोई बात नहीं। हो सकता है यह आपका पहला ही अवसर हो। जिन्होंने कोशिश करके इतने बड़े जनसमुदाय के सामने बोलने का साहस किया वे सचमुच प्रशंसा के पात्र हैं।

भाषण एक कला है। बड़ी मेहनत करनी पड़ती है इस कला को सीखने में। कुछ

जनताः 17 जनवरी, 1948