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यह राजनीतिक नजरिया खो दिया। विधानसभा जैसी लोगों की सहयोग पर आधारित संस्थाएं विनष्ट हुईं और हम एकतंत्री राजा के नागरिक बने। इसी कारण सुसंस्कृति ने अवनति की राह ली और अन्य समाज की तरह हिंदी समाज भी समय-समय पर पिछड़ता चला गया।
कानून बनाने का उद्देश्य होता है समाज के दोषों को दूर करना। यह हमारा दुर्भाग्य ही है, कि पिछले जमाने में नागरिकों ने समाज के दोषों को दूर करने के लिए कानून का इस्तेमाल ही नहीं किया। इसी कारण उनका विनाश हुआ।
इस देश में जितने विद्रोह हुए हैं उतने दुनिया के किसी भी राष्ट्र में नहीं हुए हैं। पोप की वर्चस्विता को हटाने के लिए यूरोप में झगड़े हुए उससे कई साल पहले भारत में धर्म आधारित कानून के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष कानून का झगड़ा चल रहा था। दुर्भाग्य से भारत में धार्मिक कानून श्रेष्ठ माना गया। मेरी राय में उसके रूप में देश पर एक बड़ी आपत्ति आन पड़ी। उस जमाने के हिंदू समाज के अप्रगतिशील लोगों के बीच कानून में बदलाव नहीं किया जा सकता यह धारणा रूढ़ हो चुकी थी और मेरी राय में यही धारणा इस आपत्ति के आने की वजह है।