उप-समिति संख्या 8
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विभागों में ही बने रहते हैं। क्या हम ऐसी सेवा रखना चाहते हैं, जो वैसी विशिष्ट न हो जैसी हम शुरू से चाहते हैं? जैसा कि मैंने अपनी सामान्य टिप्पणियों में कहा है, यह संभव है कि नया संविधान आने पर एक ही सेवा जैसे भारतीय सिविल सेवा के स्थान पर सेवाओं की श्रेणियां फिर से बनाना आवश्यक हो जाए। भारतीय सिविल सेवा ने अतीत में अच्छा कार्य किया है, लेकिन अब वह कुछ हद तक पुरानी पड़ गई है और शायद कुछ ही दिनों बाद और भी पुरानी प्रतीत होने लगे। प्रश्न यह है कि क्या इस प्रकार की प्रणाली अपनाकर हम ऐसी स्थिति को जारी नहीं रखे हुए हैं, बल्कि उसे स्थायी रूप प्रदान नहीं कर रहे हैं, जो आज की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती।
डॉ. अम्बेडकरः इस प्रश्न पर एक से अधिक दृष्टिकोणों से विचार करना होगा। सबसे पहला दृष्टिकोण है, प्रांतीय स्वायत्तता का। हम एक ऐसे संविधान का निर्माण कर रहे हैं, जिसमें हमारा प्रांतों को यथासंभव अधिक से अधिक प्रांतीय स्वायत्तता देने का प्रस्ताव है और मुझे लगता है कि कोई भी प्रांत जिसे अपने क्षेत्र में कार्यरत सिविल सेवा पर नियंत्रण रखने का अधिकार न हो, प्रांतीय दृष्टि से स्वायत्त नहीं माना जा सकता। एक और दृष्टिकोण जो बहुत मत्वपूर्ण है, वित्त है। जब हमारे यहां अखिल भारतीय सिविल सेवा है, तो उसके वेतनमान भी नियत हैं। वेतन, पारिश्रमिक और अन्य विशेष अधिकारों का स्तर ऐसा है, जो विभिन्न प्रांतों से बहुत अलग-अलग है। ऐसी सिविल सेवा, जो बंबई या बंगाल के लिए महंगी न हो, छोटे और गरीब प्रांतों के लिए जैसे असम, सिंध, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और पंजाब के लिए महंगी हो सकती है और यह भी हो सकता है कि यदि इन प्रांतों को अखिल भारतीय स्तर की सेवा से कुछ कम दक्ष सेवा दे दी जाए, तो भी वे संतुष्ट हो जाएंगे। जब वित्त पर उनको अधिकार होगा, तो उन्हें जिस स्तर के बुद्धिमान और दक्ष अधिकारी उपलब्ध होंगे, वे उनके प्रयोजन के लिए पर्याप्त होंगे। अंत में जहां तक विशेषता का प्रश्न है, मैं भी श्री बसु से सहमत हूं। मेरी समझ में यह नहीं आता कि भारतीय सिविल सेवा, जैसी परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने भर से किसी व्यक्ति में किसी विशिष्ट विभाग में सेवा करने की सामर्थ्य कैसे आ जाती है। जिस व्यक्ति ने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा गणित को विशेष विषय के रूप में लेकर पास की हो, संभव है कि उसे कृषि विभाग या भारतीय मुद्रा विभाग में नियुक्त कर दिया जाए। हमारे यहां तो ऐसी सेवा-व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें भाग लेने वालों के लिए एक नियत स्तर शिक्षा ही सुनिश्चित न हो, बल्कि उसके सदस्यों में किसी क्षेत्र विशेष का विशिष्ट ज्ञान भी होना चाहिए। मेरा मत है कि इनमें से कुछ सेवाओं का अखिल भारतीय स्वरूप अब समाप्त हो जाना चाहिए और प्रांतों को यह स्वतंत्रता दे दी जानी चाहिए कि वे चादर देखकर पांव पसार सकें।
माननीय ए.पी. पात्रेः डॉ. अम्बेडकर ने जो आपत्ति उठाई है, वह बहुत प्रासंगिक है।
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