7. उप-समिति संख्या 8 (सेवाएं) - Page 111

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अध्यक्षऽः श्री बसु ने डॉ. अम्बेडकर के विचारों पर जो मत प्रकट किया है उस पर भी स्पष्ट रूप से विचार किया जाना चाहिए। हमें यह बात बड़ी सावधानी से स्पष्ट करनी चाहिए कि भारतीय सिविल सेवा में भर्ती के लिए सिफारिश करते समय हम भारतीय सिविल सेवा को जो अच्छी तो है, लेकिन उसे निर्दोष नहीं मानते, या उसे कोई ऐसी चीज नहीं समझते जिसे इसके वर्तमान रूप में हमेशा के लिए बनाए रखा जाए। उसका पुनर्गठन करने या नया रूप प्रदान करने के लिए जो कुछ संभव हो, करना आवश्यक है। जो महानुभाव डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा के हैं, उनका सुझाव है कि अखिल भारतीय सेवाओं को समाप्त कर दिया जाए, उनके स्थान पर छोटी प्रांतीय सेवाएं गठित की जाएं।

डॉ. अम्बेडकरः मैं समझता हूं कि मुझे अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर देना चिहए। इस समिति के शेष सदस्यों की तरह मेरा भी यह मत है कि सेवा में यूरोपीय मूल का होना आवश्यक है, लेकिन मैं नोबल लॉर्ड जैटलैंड के इस मत से सहमत नहीं हूं। यदि सेवा को प्रांतीय बना दिया गया, तो उससे भर्ती का स्रोत ही सूख जाएगा।

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अध्यक्षऽऽः सुझाव यह है कि हमें 1939 या जो भी तारीख आप चाहें, तय कर देनी चाहिए, तारीख में कोई जादू तो होता नहीं। सुझाव केवल कोई तारीख निश्चित करने और यह स्पष्ट बता देने के लिए है कि इसके बाद इस मामले पर भारत सरकार विचार करे। यह सुझाव मैंने इसलिए रखा है कि इस पर सभी सहमत हो सकें।

डॉ. अम्बेडकरः मेरा मत यह है कि आपकी सिफारिशें केवल भारतीय सिविल सेवा और भारतीय पुलिस सेवा पर ही लागू होनी चाहिएं।

अध्यक्षः मैं इससे सहमत हूं और इसे स्पष्ट कर दूंगा।

तीसरी बैठक - 8 जनवरी, 1931

डॉ. अम्बेडकरऽऽऽः महोदय! मैं यह बताना चाहता हूं कि भावी भारत सरकार का मार्गदर्शन करने के लिए कोई समिति गठित की जाए या नहीं, इस प्रश्न पर तो मेरी कोई पुख्ता राय नहीं है, लेकिन दो मामले ऐसे हैं, जिन पर मेरा दृढ़ मत है। पहला तो यह कि मेरे विचार में अब वह समय आ गया है, जब सभी विभागों के व्यक्तियों के लिए एक समान भारतीय सिविल सेवा के स्थान पर इसके बाद से सेवाओं के विशिष्टीकरण लिए कोई प्रावधान किया जाए, जिसमें दक्षता इस समय की अपेक्षा कहीं बेहतर ढंग से प्राप्त की जा सके। मैं भारतीय सिविल सेवा की क्षमता के बारे में कुछ नहीं कहूंगा,

ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 8 (सर्विसेज), पृ. 57-58

ऽऽ वही, पृ. 85

ऽऽऽ वहीं, पृ. 91-93