उप-समिति संख्या 8
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क्योंकि मेरे विचार से यह बात आम तौर पर मानी जाती है कि यह एक सक्षम सिविल सेवा है, लेकिन इसके बावजूद मेरा यही मानना है कि जिस प्रकार का प्रशिक्षण भारतीय सिविल सेवा के सदस्यों को दिया जाता है, वह कुछ तकनीकी अथवा कतिपय विशिष्ट विभागों में कुछ विशिष्ट कर्तव्यों के निर्वाह के लिए पर्याप्त नहीं होता। परिणामस्वरूप, यह आवश्यक है कि भारतीय सिविल सेवा को पुनः संगठित किया जाए, ताकि हम इस सेवा में कुछ अधिक दक्षता ला सकें। यह एक ऐसी बात है, जिसके संबंध में मेरी धारणा बड़ी प्रबल है। दूसरी बात, जिसके बारे में मेरी धारणा और भी प्रबल है, वह यह है कि यद्यपि हम सब इस बात पर एकमत हैं कि भारतीय सिविल सेवा में भारतीयकरण होना चाहिए और भारतीय सिविल सेवा में उससे कहीं अधिक तेजी से भारतीयकरण होना चाहिए, जितना अब तक सोचा गया है। मेरा समिति से निवेदन है कि इस मुद्दे पर यदि भारतीय करदाता के दृष्टिकोण से विचार किया जाए, तो यह कहीं अधिक आवश्यक हो जाता है कि यह भारतीयकरण सेवा के कार्मिकों में परिवर्तन की हद तक ही नहीं होना चाहिए, बल्कि यह ऐसा भारतीयकरण होना चाहिए, जिसके फलस्वरूप भारतीय करदाता का भार कुछ कम हो जाए। भारतीय सिविल सेवा के भारतीय मूल और भारतीय सिविल सेवा के यूरोपीय मूल के बीच पारिश्रमिक, वेतन, मूल वेतन और पेंशन तथा अन्य सुविधाओं के कुछ भेद होने चाहिएं। मैं इस संबंध में समिति का ध्यान लंका के संविधान के लिए अनोफमोर आयोग द्वारा की गई सिफारिशों की ओर दिलाना चाहता हूं। संविधान के पृ. 133 पर उन्होंने सिफारिश की है कि लंका सरकार इसके बाद से एक वेतन आयोग नियुक्त करे और उस वेतन आयोग के संबंध में यह सुस्पष्ट सिफारिश करे कि लंका सिविल सेवा में यूरोपीय तत्व और लंका सिविल सेवा के लंकाई मूल के पारिश्रमिक में भेद रखा जाए और उन्होंने इसका औचित्य इस प्रकार प्रतिपादित किया हैः ‘मामले के गुणावगुण को देखते हुए यह स्पष्ट है कि लोक सेवकों के दोनो वर्गों को समान आधार पर पारिश्रमिक देने का कोई तार्किक औचित्य है। ख्. . ., एक वर्ग में ऐसे लोग हैं, जो शीतोष्ण जलवायु से, जो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है - बहिष्कृत करके उष्णकटिबंधीय देश में, जो उनके देश से हजारों मील दूर स्थित है, तैनात किए गए हैं। वह देश ऐसा है, जिसमें उनके लिए अपने बच्चों का पालन-पोषण असंभव है और जिसके कारण उनके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए नियमित अंतरालों पर छुट्टठ्ठी लेकर स्वदेश जाएं। वह देश, जिसकी सेवा में वे न केवल दोहरी घर-गृहस्थी को चलाने में आने वाली कठिनाइयों को झेलने के लिए बाध्य होते हैं, अपना स्वास्थ्य खतरे में डालते हैं और अपने पारिवारिक संबंधों की बलि देते हैं, बल्कि काफी कुछ खर्च करके जीवन तथा आतिथ्य का वे स्तर बनाए रखते हैं, जो उनकी अपनी और सेवा की पंरपराओं के अनुरूप हो, जो सवा सौ से अधिक वर्षों से एक महान साम्राज्यिक शक्ति की प्रतीक रही है। दूसरी ओर, उन्हीं के साथी वे लोग हैं, जो स्वदेश में रहते हैं और काम करते हैं। उनके घर-बार पास में ही हैं,