96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उन्हें मौसम की परेशानियां नहीं उठानी पड़तीं। उन्हें अपने यूरोपीय सहयोगियों पर लदे आर्थिक भार का केवल अल्पांश ही झेलना पड़ता है। यह जाहिर है कि लेक सेवकों के पहले वर्ग को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप वेतन दिया जाना चाहिए, जो उनके कार्य के वास्तविक मूल्य से कहीं अधिक हो, क्योंकि उन्हें अपने कार्य-निष्पादन में व्यक्तिगत जोखिम ही नहीं उठाना पड़ता, बल्कि त्याग भी करना पड़ता है। इस बात का कोई तर्कसंगत औचित्य नहीं है कि पूर्वोक्त वर्ग को जो मुआवजा दिया जाना आवश्यक है, वह पश्चोक्त को भी दिया जाए। ‘मैं समझता हूं ये टिप्पणियां इतने ही जोर के साथ भारत की परिस्थितियों पर भी चरितार्थ होती हैं। यदि यह उप-समिति इन दो मुद्दों को स्वीकार कर लेती है, जो मैं उसके सामने पेश कर रहा हूं, अर्थात् भारतीय सिविल सेवा विविधीकरण की आवश्यकता और भारतीय सिविल सेवा में दोनों मूलों के बीच पारिश्रमिक में विभेद की आवश्यकता, तो मेरे विचार में इसका आवश्यक परिणाम यही होगा कि किसी संगठन की स्थापना की जाए, जो भारत सरकार को इन सिफारिशों को कार्य रूप देने में सलाह दे सके। इन्हीं कारणों से मैं उस सुझाव का समर्थन करता हूं कि नए संविधान के प्रभावी हो जाने के बाद भारत सरकार को ऐसी समिति की स्थापना का अधिकार दिया जाए, जिसकी सिफारिश मद सं. 6 में की गई है।
अध्यक्षः क्या मैं उप-समिति के मार्गदर्शन के लिए यह बात कह सकता हूं कि चूंकि हमारे विचारार्थ विषयों के अंतर्गत वे संबंध आते हैं, जो सेवाओं के नए राजनीतिक ढांचे के साथ होंगे, इसलिए जाहिर है कि हम वेतनादि के प्रश्न पर सविस्तार चर्चा नहीं कर सकते। फिलहाल अधिकारियों के वेतन में जो भेद है, उसका आधार गैर-एशियाई अधिवास है। मेरा ख्याल है कि आप सभी यह जानते हैं। इससे जो अंतर पड़ता है, वह यह है कि जो गैर-एशियाई अधिवासी हैं, उन्हें समुद्र-पारीय वेतन मिलता है जिससे लगभग 300 पौंड की वृद्धि होती है।
डॉ. अम्बेडकरः मैं समझता हूं कि मुद्दे का इससे दूर का भी वास्ता नहीं। आप यूरोपीयों के वेतन में वृद्धि करके इस प्रकार का भेद पैदा कर सकते हैं। लेकिन इससे भारतीयों को कोई राहत नहीं मिलेगी।
माननीय ए.पी. पात्रेः मैं समझता हूं, डॉ. अम्बेडकर ने जो कारण दिए हैं उनसे मद सं. 6 में उठाए गए दो प्रश्नों के सकारात्मक उत्तर देना आवश्यक हो जाता है। मेरा विचार है कि उन्होंने भारतीयकरण के विषय में जांच-पड़ताल के लिए अपना पक्ष बड़े जोरदार ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने जो प्रसंग उठाया है, वह यह है कि सही प्रकार के रंगरूट आकर्षित करने के लिए क्या शर्तें दरकार होंगी? यह बड़े महत्व की बात है। यदि समिति का यह मत हो कि श्रेष्ठ व्यक्तियों को आकर्षित करने के लिए वर्तमान शर्तों में कुछ फेर-बदल किया जाए और उन्हें नया रूप दिया जाए, तो समिति मामले के उस पक्ष पर भी विचार करेगी और उसके लिए एक समिति का गठन आवश्यक होगा।