उप-समिति संख्या 8
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दूसरी विशेष बात यह है कि यह कहा जाता है कि भावी भारत सरकार को इस मामले की छानबीन करने का अधिकार होना चाहिए और यह देखते हुए कि उस समय उभरने वाली परिस्थितियों में क्या आवश्यक होगा, मुझे आशंका है कि यह धारणा बनी हुई है कि भावी भारत सरकार में ऐसा भारी परिवर्तन हो जाएगा कि मंत्रिगण वर्तमान प्रणाली में क्रांति लाने का भरसक प्रयास करेंगे। इस बात को हम जितनी जल्दी भूल जाएं उतना ही हमारे लिए लाभप्रद होगा और तब सेवा की इन शर्तों के संबंध में हमारी संकल्पना अधिक युक्तियुक्त बन पड़ेगी।
आखिरकार, हम यह तो जानते ही हैं कि केंद्र पर बहुत सीमित दायित्व रहेगा। मंत्रियों की जिम्मेदारी सीमित हो जाएगी। इसलिए हमें अपने पिछले अनुभव से यह सीखना चाहिए कि भावी भारत सरकार का कुछ मार्ग-दर्शन किया जाए। उसे नए सिरे से कुछ न करने दिया जाए। यह सर्वथा व्यावहारिक मामला है और मद सं. 6 के दोनों भागों के संबंध में मेरा उत्तर सकारात्मक है।
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डॉ. अम्बेडकरऽः आप मूल अधिकारों के प्रश्न को जिन शब्दों में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं, उनसे उत्पन्न होने वाली कठिनाई के बारे में मैं संकेत देना चाहता हूं। बात यह है कि आप लोक सेवाओं को जो निर्देश दे रहे हैं कि सेवाओं में भर्ती करते समय उचित और पर्याप्त प्रतिनिधित्व पर विचार करें - चाहे आपके शब्द कोई भी हों। इसका अर्थ यह हुआ कि आयोग को उस समुदाय का कोटा पूरा करने के लिए जो अन्यथा सेवाओं में प्रवेश नहीं कर पाते, विभिन्न समुदायों में चयन का अधिकार होगा। इसका मतलब यह हुआ कि अन्य समुदायों के उचित तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व की मांग को पूरा करने के लिए जिन्हें अब तक लोक सेवा में भर्ती अवसर नहीं मिल पाया है, उन्हें अन्य समुदायों के सदस्यों को वंचित करना पड़ेगा और यदि आप यह मूल अधिकार प्रत्येक समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति को दिलवा देते हैं, तो उससे लोक सेवा आयोग के लिए उलझन पैदा हो जाएगी। इसलिए कि जिस व्यक्ति को इस प्रकार का मूल अधिकार प्राप्त था वह कहेगाः ‘आप किसी दूसरे समुदाय के किसी अन्य सदस्य को तरजीह देकर मेरे साथ पक्षपात कर रहे हैं।’ मेरी दृष्टि में यही एक कठिनाई है।
माननीय सी. सीतलवाडः मैं यह बताना चाहता हूं कि मूल अधिकारों का यह जो प्रतिपादन किया गया है कि धर्म, जाति या मत के आधार पर किसी को अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा, सम्राज्ञी विक्टोरिया की उस घोषणा की पुनरावृत्ति मात्र है, जब ताज ने भारत सरकार को अपने अधिकार में लिया था, उस समय की गई घोषणा में इसे शामिल किया गया था।
राजा नरेन्द्र नाथः इससे व्यावहारिक कठिनाई का समाधान नहीं होता।
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 8 (सर्विसेज), पृ. 111-13