102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में जो शक्तियां निहित थीं, उन्हें बनाए रखा जाए और मैं इसके साथ ही अन्य कई सुझाव पेश करना चाहता हूं, जैसे किसी प्रांत में पुलिस परिषद का गठन, जिस पर उप-समिति विचार करें।
डॉ. अम्बेडकरः यदि आप मुझे अनुमति दें, तो मैं अपनी जानकारी के लिए एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। क्या नोबल मारक्विस यह चाहते हैं कि महानिरीक्षक के पद को संविधि द्वारा मान्यता प्रदान की जाए या वे चाहते हैं कि पुलिस अधिनियम के अधीन जो पद हैं, उसी को जारी रहने दिया जाए? क्या वे उन्हें संविधि द्वारा ऐसे अधिकारियों के रूप में मान्यता दिलाना चाहते हैं, जिनके कुछ सांविधिक अधिकार और दायित्व हों?
लॉर्ड जैटलैंडः जी हां।
माननीय पी.सी. मित्तरः संसद की संविधि द्वारा?
लॉर्ड जैटलैंडः जी हां, वही। महानिरीक्षक के पास अब भी वे शक्तियां संविधि, अर्थात् पुलिस अधिनियम के अनुसार ही दी गई हैं।
डॉ. अम्बेडकरः यह पुलिस अधिनियम से भिन्न है और वास्तव में इसमें स्थानीय विधान-मंडल द्वारा संशोधन किए जाने की शर्त भी है। प्रश्न यह है कि क्या आप चाहते हैं कि महानिरीक्षक का पद एक ऐसे अधिकारी का पद मान लिया जाए, जो कुछ कर्तव्यों का निर्वाह करता है और एक अधिकारी की हैसियत से उसके मामले में मंत्री या स्थानीय सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती?
लॉर्ड जैटलैंडः यह तो उसका प्रभाव है। यह मेरा प्रस्ताव है। मेरा विचार है कि महानिरीक्षक में इस समय जो शक्तियां निहित हैं, उन्हें कायम रहने दिया जाए।
माननीय कावसजी जहांगीरः किस प्राधिकार से - पुलिस अधिनियम द्वारा या भारत सरकार अधिनियम द्वारा?
माननीय सी. सीतलवाडः पुलिस अधिनियम के प्रावधानों को बदलने का अधिकार स्थानीय विधान-मंडल या किसी भी विधान-मंडल को नहीं होना चाहिए।
लॉर्ड जैटलैंडः जी हां। मैं समझता हूं, यह संघीय सरकार का अधिनियम होना चाहिए।
श्री जफरुल्ला खांः ऐसा तो पुलिस अधिनियम को एक अधिनियम को एक अधिनियम के रूप में रखकर ही किया जा सकता है, जिसे कोई प्रांतीय सरकार महानिरीक्षक की सहमति के बिना न निरस्त कर सकती है, न बदल सकती है, और न ही परिशोधित कर सकती है।
डॉ. अम्बेडकरः यही स्थिति तो आज भी है, क्योंकि अधिनियम में केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना संशोधन नहीं किया जा सकता।
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ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 8 (सर्विसेज), पृ. 186-188