उप-समिति संख्या 8
103
श्री जफरुल्ला खांऽः यदि मुझे मात्र इतना जोड़ने की अनुमति हो, शायद इस समिति के सभी सदस्य इस बात से अवगत नहीं हैं कि संघीय संरचना उप-समिति और संयुक्त उप-समिति ने, जिसे उप-समिति सं. 1 और 2 ने स्थापित किया था, महत्वहीन विषयों पर अनेक अधिनियमों को धारा 80(3)(ज) के अधीन उस सूची में रखने का सुझाव दिया था और यदि हम पुलिस अधिनियम को उस सूची में स्थान दे दें, तो उससे किसी भी प्रकार के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं होगा।
डॉ. अम्बेडकरः मैं श्री जफरुल्ला खां से सामान्यतः सहमत हूं। पुलिस अधिनियम को अनुसूची में आज तक स्थान न देने का कारण यह है कि यह विषय आरक्षित विषय है, इसलिए तथ्य तो यह है कि भारत सरकार का विधि और व्यवस्था पर पूरा नियंत्रण है और जब विधि और व्यवस्था के हस्तांतरण की स्थिति उत्पन्न होती है, तो वस्तुस्थिति बिल्कुल भिन्न हो जाती है। मैं समझता हूं कि इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि हम चाहे संक्रमण काल के लिए ही सही, कुछ संरक्षणों की आवश्यकता पर विचार करें, चाहे वे उन रक्षोपायों को जारी रखने के लिए ही हों, जो इस समय मौजूद हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से इस सुझाव के पक्ष में हूं कि इस पुलिस अधिनियम को अनुसूची में शामिल कर लिया जाए, जिसके लिए आज गवर्नर जनरल या भारत सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
एक और मुद्दा जिसकी ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं, वह पुलिस और विधि और व्यवस्था विभाग के प्रश्न से संबंधित है। यही मुद्दा मैंने प्रांतीय संविधान उप-समिति में भी उठाया था। जाहिर है, इस प्रश्न पर भावी प्रांतीय सरकारों का दायित्व के दृष्टिकोण से भी विचार किया गया है। मुझे लगता है कि इस प्रश्न पर प्रांतों में रहने वाले विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों और ऐसी आपात स्थितियों की दृष्टि से भी विचार किया जाना चाहिए, जो सांप्रदायिक दंगों और ऐसी ही अन्य आपात स्थितियों में उत्पन्न होती है। मैं समझता हूं कि विभिन्न प्रांतों में रहने वाले अल्पसंख्यकों के लिए यह जानना कि जब सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे हैं, तो किस समुदाय का कौन अधिकारी उस इलाके में कानून और व्यवस्था कायम करेगा, वास्तव में एक महत्वपूर्ण संरक्षण होगा। हम सभी जानते हैं कि पुलिस अधिकारियों पर पक्षपात और एक या दूसरे संप्रदाय के प्रति सहानुभूति दर्शाने का आरोप लगाया जाता है। इस प्रकार के आरोप का पर्याप्त औचित्य तो नहीं है, लेकिन इसके बावजूद ऐसी घटनाएं भी हो सकती हैं, जिनमें कुछ विशेष इलाकों में उन अधिकारियों के पक्षपात का औचित्य सिद्ध किया जा सकता है। मेरा ख्याल है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के हित में यह बहुत आवश्यक है कि पुलिस अधिकारियों की तैनाती और तबादले कम से कम आपात स्थिति के दौरान मंत्रियों के हाथ में नहीं होने चाहिएं। यह संभव है कि कोई मंत्री जिसके संप्रदाय का उस प्रांत में बहुमत है किसी भी अवसर विशेष पर किसी पुलिस अधिकारी को उस स्थान से हटा