7. उप-समिति संख्या 8 (सेवाएं) - Page 121

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दे, जो शायद उस संप्रदाय के लोगों का पक्ष नहीं ले, जिसका वह मंत्री है।

श्री जफरुल्ला खांः साधारणतः तो यह काम महानिरीक्षक करते हैं।

डॉ. अम्बेडकरः मैं जानता हूं कि बंबई प्रेसिडेंसी में पुलिस अधिकारियों के स्थानांतरण को लेकर भारी हो-हल्ला मचा था। पता नहीं ऐसा पुलिस निरीक्षक ने करवाया था या प्रभारी अधिकारी ने, लेकिन मैं समझता हूं कि यह एक बहुत बड़ा संरक्षण है, जिसके लिए भावी भारत के संविधान में प्रावधान करना आवश्यक है।

इस संबंध में मेरा विशिष्ट प्रस्ताव यह है कि आपात स्थिति में जब भी कोई दंगा-फसाद या सांप्रदायिक उपद्रव उठ खड़ा हो, तो विभिन्न इलाकों में पुलिस की कार्रवाई में मंत्री के स्थान पर गवर्नर को प्रशासनिक शक्तियां दी जानी चाहिए।

पांचवी बैठक - 12 जनवरी, 1931

अध्यक्षऽः डॉ. अम्बेडकर, श्री जफरुल्ला खां और सरदार संपूरन सिंह को यह पसंद नहीं है कि भारतीय सिविल सेवा में यूरोपीय मूल के अलावा अखिल भारतीय स्तर पर आगे किसी प्रकार की भर्ती की जाए। कुछ सदस्यों की यह भी राय है कि न्यायिक पदों के लिए भर्ती आगे से भारतीय सिविल सेवा में से नहीं की जाए।

डॉ. अम्बेडकरः महोदय! भारतीय पुलिस सेवा में भी।

अध्यक्षः तो क्या आप उसे यों रखना चाहते हैं, ‘भारतीय सिविल सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में’?

डॉ. अम्बेडकरः जी हां।

अध्यक्षः क्या यही मत श्री जफरुल्ला खां का भी है?

श्री जफरुल्ला खांः जी हां।

अध्यक्षः और सरदार संपूरन सिंह का भी?

सरदार संपूरन सिंहः बिल्कुल।

अध्यक्षः मेरा अभिप्राय केवल आपके मत अभिलिखित करना है। इसलिए मैं यह शब्द रख देता हूं ‘और भारतीय पुलिस सेवा के लिए’।

छठी बैठक - 13 जनवरी, 1931

डॉ. अम्बेडकरऽऽः मैं उप-पैराग्राफ (4) के बाद इस आशय के एक नए पैराग्राफ का समावेश करना चाहता हूंः ‘उप-समिति चाहती है कि लोक सेवा में दलित वर्गों को

ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 8 (सर्विसेज), पृ. 198

ऽऽ वही, पृ. 231-33