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पूर्ण अधिवेशन (सामान्य पुनर्विलोकन)

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मैंने लॉर्ड चांसलर को एक वक्तव्यऽ प्रस्तुत किया था, जिसमें संघीय भारत के भावी संविधान के बारे में मेरे मत शामिल थे। मुझे नहीं मालूम कि जिस समिति की उन्होंने अध्यक्षता की थी, उसने उन पर विचार भी किया था या नहीं। क्योंकि मुझे समिति की रिपोर्ट जिसके वे अध्यक्ष थे, इसका कोई हवाला नहीं मिला। मेरे आज भी वही विचार हैं, जो उसमें व्यक्त किए गए थे और मैं ऐसे संविधान को अपना समर्थन नहीं दे सकता, जो मेरे उन विचारों से इतना अधिक भिन्न है। बल्कि यदि मुझे वर्तमान प्रणाली और समिति जन्य इस संकर प्रणाली में से चयन करने को कहा जाए, तो मैं वर्तमान प्रणाली को ही तरजीह दूंगा। लेकिन महोदय! यदि समिति की रिपोर्ट में समाविष्ट केंद्र सरकार से माननीय तेज बहादुर सपू्र, जो इस सम्मेलन के मित्र, मार्गदर्शक और विचारक रहे हैं, संतुष्ट हैं, यदि इससे श्री जयकर, जो स्वयं को भारत के युवाओं का प्रतिनिधि घोषित करते हैं और यदि इससे माननीय ए.पी. पात्रे प्रसन्न हैं, जो भारत के गैर-ब्राह्मणों के प्रतिनिधि हैं, तो फिर मेरे लिए इसका विरोध करना निरर्थक है। इसलिए मेरा दृष्टिकोण उस व्यक्ति जैसा है, जो किसी बात का अनुमोदन भी नहीं करता और न ही उसमें बाधा डालता है, मैं इसे उन पर छोड़ता हूं, जो सफलता की कामना करते हैं।

ऐसा रवैया मुझे ज्यादा पसंद है, क्योंकि मेरे पास सरकार के स्वरूप के बारे में उन लोगों का कोई आदेश नहीं है, जिनका मैं प्रतिनिधि हूं। लेकिन मेरे पास एक आदेश है और वह यह कि उत्तरदायी सरकार का विरोध न करते हुए भी इस बात का ध्यान रखना कि कोई भी उत्तरदायी सरकार तब तक स्थापित न हो पाए, जब तक कि वह सच्चे अर्थ में प्रतिनिधि सरकार न हो। जब मैं सम्मेलन की उपलब्धि पर यह जानने के लिए नजर डालता हूं कि उसने प्रतिनिधि सरकार के प्रश्न का समाधान किस प्रकार किया है, तो मुझे घोर निराशा होती है। मताधिकार और विधान-मंडलों में विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व ऐसी दो बातें हैं, जिन पर सच्चे अर्थ में प्रतिनिधि सरकार आधारित होती है। हर व्यक्ति यह जानता है कि नेहरू समिति ने वयस्क मताधिकार को माना था और संविधान के जिस भाग का उन्होंने निर्माण किया था, उसे भारत के सभी राजनीतिक दलों ने समर्थन दिया था। जब मैं इस सम्मेलन में आया तो मैंने सोचा था कि जहां तक मताधिकार के प्रश्न का संबंध है, लड़ाई जीती जा चुकी है। लेकिन मताधिकार समिति में पहुंचकर मेरी आंखें खुल गईं। मुझे यह देखकर अत्यधिक आश्चर्य हुआ कि उन सभी लोगों ने जिन्होंने नेहरू रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए थे, के मन में कुछ और ही था। यहां तक कि भारतीय उदारवादियों को भी प्रांतीय विधान-मंडलों में जनसंख्या के 25 प्रतिशत लोगों को मताधिकार दिलाने के लिए सहमत होने के लिए तैयार करना भी मुश्किल हो गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि केंद्रीय विधान-मंडल के लिए मताधिकार की योग्यता क्या है? कोई नहीं जानता। लेकिन मुझे यह उम्मीद बिल्कुल नहीं है कि वह ऐसा होगा,

ऽ लॉर्ड चांसलर उप-समिति सं. 1 (संघीय संरचना) के अध्यक्ष थे, जिसके डॉ. अम्बेडकर सदस्य नहीं थे।

लगता है कि ऊपर जिस वक्तव्य का उल्लेख किया गया है, उस पर विचार ही नहीं किया गया था।