110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जिससे कि प्रांतीय विधान-मंडलों की तुलना में केंद्रीय विधान-मंडल जनता का अधिक प्रतिनिधित्व कर सकेगा। यदि मताधिकार इतना सीमित होगा, तो उसका एकमात्र परिणाम यही हो सकता है कि भारत की भावी सरकार वर्गों द्वारा संचालित जनता की सरकार बन जाएगी।
जहां तक सीटों के बहुसंख्यक और विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के बीच वितरण का प्रश्न है, हम सभी यह जानते हैं कि इस पर गतिरोध है। मेरी राय में यह गतिरोध अधिकांशतः अतीत की शरारत का नतीजा है। मुझे विश्वास है कि यदि भारत में प्राधिकारियों ने ‘सबके लिए न्याय, किसी के लिए पक्षपात नहीं’, का सिद्धांत अपनाया होता, तो समस्या का समाधान इतना कठिन नहीं बन जाता। ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न समुदायों के लिए उनसे प्राप्त राजनीतिक लाभ के अनुसार भिन्न-भिन्न मान्यताएं निर्धारित कीं और अनेक समुदायों को राजनीतिक शक्ति का असाधारण अंश देकर दलित वर्गों को उनके देय अंश से वंचित किया। इस प्रकार सबसे अधिक नुकसान दलित वर्गों को हुआ। मैं यही आशा करता रहा कि यह सममेलन इसी सिद्धांत का पालन करेगा कि जिस मसले को गलत ढंग से तय किया जाता है, वह कभी तय नहीं हो पाता और प्राचीन मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करके दलित वर्गों को उनकी सीटों का न्यायपूर्ण कोटा मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। अन्य अल्पसंख्यकों के दावों को पहले से ही स्वीकार कर लिया गया है और निश्चित कर दिया गया है। अब उनकी केवल यही आवश्यकता शेष है कि परिवर्तन और संशोधन करके उन्हें नई सरकार के विस्तृत ढांचे और बढ़े हुए कार्य-क्षेत्र के अनुरूप बना दिया जाए। जो भी परिवर्तन-संशोधन हों, उन बुनियादों को
खोदने का साहस कोई भी नहीं कर सकता, जो पहले से रख दी गई हैं। दलित वर्गों का मामला बिल्कुल भिन्न है। उनके दावों की तो अभी ही सुनवाई हुई है। अभी तो उनका न्याय-संगत निर्णय भी नहीं हुआ है और मैं नहीं जानता कि उनमें से कितनों को प्रवेश दिया जाएगा। मेरा ख्याल है कि उनकी दयनीय स्थिति को देखते हुए यह भी असंभव नहीं है कि दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के लिए मांगों को इस सीमा तक घटा दिया जाए कि अन्य समुदायों की आए दिन बढ़ती हुई छीना-झपटी समाप्त की जा सके, जो संरक्षण के लिए नहीं बल्कि सत्ता के लिए जोड़-तोड़ कर रहे हैं।
ऐसी स्थिति को देखते हुए आवश्यक है कि मैं अपना दृष्टिकोण सर्वथा स्पष्ट कर दूं। चूंकि भावी संविधान में दलित वर्गों के क्या अधिकार होंगे, यह निश्चित नहीं किया गया है, इसलिए महामहिम की सरकार की ओर से केंद्र तथा प्रांतों के दायित्व के संबंध में, जो भी घोषणा की जाए, उसमें यह बात स्पष्ट कर दी जानी चाहिए कि उस दिशा में उठाया गया कोई भी कदम इसी शर्त पर और उन समुदायों के बीच हुए करार के आधार पर उठाया जाए, जिससे दलित वर्गों के हितों और अधिकारों की कारगर सुरक्षा