पूर्ण अधिवेशन (सामान्य पुनर्विलोकन)
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सुनिश्चित हो सके। स्थिति की गंभीरता पर बल देते हुए, मैं आपका ध्यान इस बात की ओर दिलाना चाहता हूं कि यदि इस संबंध में स्थिति पूर्णतः स्पष्ट नहीं हो जाती, तो हमें कोई भी घोषणा स्वीकार्य नहीं होगी और यदि ऐसा हुआ, तो मैं और मेरे सहयोगी सम्मेलन की आगे की कार्यवाही में भाग लेने की कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे और इससे अपना संबंध विच्छेद करने पर बाध्य होंगे।
महोदय! मैं आपसे यह मांग करते हुए केवल यही अपेक्षा करता हूं कि आप अपने वचन को कार्य रूप दें। ब्रिटिश संसद और उसके प्रवक्ताओं ने हमेशा यह दावा किया है कि वे दलित वर्गों के न्यासी हैं और मुझे विश्वास है कि वे जो कुछ कह रहे हैं, वह सभ्यता के द्योतक उन परंपरागत असत्यों में से नहीं हैं, जिनका हम सभी मानव संबंधों को यथासंभव सुखद बनाए रखने के लिए प्रयोग करते हैं। इसलिए मेरी राय में प्रत्येक सरकार का कर्त्तव्य है कि विश्वास भंग न हो और प्रधानमंत्री महोदय! मुझे यह कहने की अनुमति दीजिए कि यदि ऐसा करके आपने हमें उन लोगों की दया पर छोड़ दिया, जिन्होंने हमारे कल्याण में कोई रुचि नहीं दर्शायी है और जिनकी समृद्धि और महानता हमारे विनाश और अधोगति पर टिकी हुई है, तो दलित वर्ग इसे महामहिम की सरकार द्वारा किया गया महान विश्वासघात मानेंगे।
अपने इस कथन के लिए भारत के राष्ट्रवादी और देशभक्त मुझे संप्रदायवादी कहेंगे। लेकिन मैं इससे नहीं डरता। भारत एक विलक्षण देश है। उसके राष्ट्रवादी और देशभक्त लोग विलक्षण हैं। भारत में देशभक्त और राष्ट्रवादी वह माना जाता है, जो अपने बंधुओं के साथ अमानुषिक व्यवहार होता देख सके ओर उसकी मानवीयता विरोध में न खड़ी हो। वह जानता है कि पुरुष-स्त्रियों को अकारण ही उनके मानव अधिकारों से वंचित रखा जाता है, लेकिन उसका नागरिकता बोध उसे किसी उपयोगी कार्य के लिए नहीं उकसाता। वह देखता है कि एक पूरे वर्ग के लिए लोक नियोजन के द्वार बंद हैं। लेकिन यह देखकर भी उसका न्याय और ईमानदारी का बोध नहीं जगता। वह देखता है कि ऐसे सैकड़ों रिवाज समाज में प्रचलित हैं, जो मनुष्य और समाज को क्षति पहुंचाते हैं, लेकिन उसमें जुगुप्सा का भाव उत्पन्न नहीं होता। देशभक्त की एक पुकार में जो शक्ति है, वह उसी के लिए नहीं, वरन् उसके समस्त वर्ग के लिए बहुत बड़ी शक्ति होती है। मुझे खुशी है कि मैं देशभक्तों के उस वर्ग का नहीं हूं। मेरा संबंध तो उस वर्ग से है, जिसका लोकतंत्र के प्रति एक सुस्पष्ट दृष्टिकोण है और जो एकाधिकार को समूल नष्ट करने के लिए कृतसंकल्प है। हमारा लक्ष्य जीवन के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सभी क्षेत्रों में ‘एक व्यक्ति, एक मान्यता’ के आदर्श का प्रतिफल देखना है। चूंकि प्रतिनिधि सरकार उसी साध्य का एक साधन है, इसलिए दलित वर्ग उसको बहुत महत्व देता है और चूंकि हमारे लिए इसका इतना महत्व है, मैंने आपसे यह आग्रह