9. संघीय संरचना समिति - Page 131

114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में मैं कुछ निश्चित योगदान भी कर सकता हूं।

मैं जिस विषय पर सबसे पहले कुछ कहना चाहता हूं, वह है संघीय विधान-मंडल की संरचना और इससे पहले कि मैं इस विषय में कुछ बोलूं, मैं इस संबंध में अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि भावी भारत का विधान-मंडल एक सदन वाला हो या दो सदनों वाला। शुरू में ही मैं यह बता दूं कि दो सदनों वाली विधान-मंडल प्रणाली में मेरी कोई आस्था नहीं है। मैंने यह कभी स्वीकार नहीं किया है कि एक और सदन बनाने की भी कोई उपयोगिता हो सकती है। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि ऐसे बहुत से लोग हैं, जो मेरे इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं होंगे, चाहे इस बारे में मेरा कैसा भी दृढ़ मत क्यों न हो। मैं यह भी जानता हूं कि इस सम्मेलन में हम लोगों को इस बात के लिए राजी भी नहीं करा सकते कि एक और सदन बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। दूसरे, मैं यह भी अनुभव करता हूं कि अगर दोनों सदनों के बीच के संबंधों को ठीक ढंग से नियंत्रित कर दिया जाए, और ऐसे तरीके भी हैं जिनको अपनाने से दूसरे सदन के सिद्धांतों को काट-छांटकर छोटा किया जा सकता है, ताकि यह दूसरा सदन भारत के लोकतांत्रिक सरकार के रास्ते में रोड़ा नहीं बने, इसलिए मैं भारत में दो सदनों की प्रणाली शुरू किए जाने के बारे में कोई आपत्ति भी नहीं करना चाहता।

अब मैं भारत के संघीय विधान-मंडल में ब्रिटिश भारत के प्रांतों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। जब हम इस सवाल पर विचार करते हैं, तब पहली बात जो सामने आती है, वह यह है कि यह प्रतिनिधित्व प्रत्यक्ष चुनाव के आधार पर होगा या अप्रत्यक्ष चुनाव के आधार पर। जहां तक संघीय विधान सभा के निचले सदन का संबंध है, मुझे ऐसा लगता है कि इस बारे में कोई मतभेद नहीं हो सकता। यह प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा बनाई जानी चाहिए। मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूं कि इस सवाल पर विचार करते समय साइमन कमीशन ने यह सिफारिश की है कि निचला सदन प्रत्यक्ष चुनाव के आधार पर न बनाया जाकर, अप्रत्यक्ष चुनाव के आधार पर बनाया जाना चाहिए। इस कमीशन ने अपनी इस राय को पुष्ट करने के लिए यह कहा कि असलियत में प्रत्यक्ष चुनाव और अप्रत्यक्ष चुनाव में कोई अंतर नहीं है और अप्रत्यक्ष चुनाव तो प्रत्यक्ष चुनाव ही है, जिसमें एक कदम पहले ले लिया गया होता है। अगर इस तर्क के आधार पर देखा जाए, तो शायद बात यही हो, लेकिन मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली और अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में बहुत बड़ा अंतर है। मेरी राय में सबसे ज्यादा अहम बात यह है कि भारत के लोगों के दिलों में यह भावना पैदा की जानी चाहिए कि देश में अच्छी सरकार हो और उसकी जिम्मेदारी अंततोगत्वा उनकी ही है और मैं यह भी कहने का साहस करता हूं कि जब तक भारत के नागरिकों के दिल में यह बात नहीं बैठती है कि वही किसी सरकार को बनाता है और वही किसी सरकार को खत्म कर सकता है, तब तक हम भारत में एक उत्तरदायी सरकार की असली नींव रखने में कभी भी कामयाब नहीं