संघीय ढांचा समिति
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होंगे। अगर मेरा यह सुझाव सही है, तब इसका मतलब यह है कि हमें चुनाव की कोई न कोई व्यवस्था अवश्य रखनी पड़ेगी, जिससे सरकार और देश के नागरिकों के बीच सीधा संपर्क रह सके। इसलिए मेरा यह निवेदन है कि केंद्रीय सरकार और नागरिकों के बीच अप्रत्यक्ष चुनाव के इस पर्दे को हटा देना चाहिए, जिससे वे अपने द्वारा किए गए चुनाव का असर देश और सरकार तथा स्वयं अपने हितों पर देख सकें। इसलिए मैं किसी भी हालत में ऐसी प्रणाली के अपनाए जाने के बारे में अपनी सहमति नहीं दे सकता, जिसमें संघीय विधान-सभा के निचले सदन के लिए प्रत्यक्ष चुनाव किए जाने का प्रावधान न हो।
अब मैं उच्च सदन के गठन को लेता हूं। मैं संघीय संरचना उप-समिति के सुझाव का अनुमोदन करता हूं कि यह अप्रत्यक्ष चुनाव के आधार पर गठित किया जाना चाहिए, जिसमें प्रांतीय विधान परिषदें चुनाव क्षेत्र के रूप में रहेंगी। मैं इस पद्धति का अनुमोदन इसलिए करता हूं कि इसमें चुनाव पृथक अथवा सांप्रदायिक निर्वाचक-मंडलों के अलग-अलग चुनाव प्रणालियों के आधार पर न होकर, आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर होगा। मैं समझता हूं कि भारत जैसे देश के लिए यह बड़ी ही शुभ बात होगी कि यहां एक ऐसा सदन होगा, जो गैर-सांप्रदायिक होगा, एक ऐसा सदन होगा, जिसमें चुनकर आए प्रतिनिधि सिर्फ एक ही समुदाय के नहीं होंगे, बल्कि इस चुनाव का आधार व्यापक होगा। इसकी वजह यह है कि हम यहां पर कई एक कारणों से अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग प्रतिनिधि चुनने की प्रणाली अपनाने से बच नहीं सकते। हम विभिन्न वर्गों के हितों की रक्षा करने की उपेक्षा भी नहीं कर सकते। इस बारे में मेरी सिर्फ एक टिप्पणी है, जो मैं इस प्रस्ताव के बारे में कहना चाहता हूं। अनुपात के आधार पर प्रतिनिधि चुनने की प्रणाली के बारे में मेरी कोई आपत्ति नहीं है और जैसा मैं कह चुका हूं, मैं इसका अनुमोदन करता हूं। इस समिति के सभी सदस्य यह जानते हैं कि भारत में जो अल्पसंख्यक लोग हैं, वे विभिन्न विधान-मंडलों में अपने-अपने हितों और वर्गों के लिए प्रतिनिधित्व ही नहीं चाहते हैं, बल्कि उनका इस बात पर भी जोर है कि कुछ निश्चित मात्रा में उनका प्रतिनिधित्व रहे। मेरी शंका यह है कि हो सकता है कि अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व की प्रणाली में उन्हें उच्च सदन में कुछ प्रतिनिधित्व मिल जाए, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि विभिन्न समुदायों के लोगों को उच्च सदन में उतनी मात्रा तक प्रतिनिधित्व मिल जाएगा, जितना कि वे चाहते हैं, क्योंकि इस प्रणाली के परिणाम के बारे में कभी निश्चित नहीं हुआ जा सकता। इसलिए मैं यह सुझाव देना चाहता हूं कि संघीय संरचना उप-समिति की इस सिफारिश में ऑस्ट्रियाई संविधान के अनुच्छेद 35 के आधार पर इस उपबंध को जोड़ दिया जाना चाहिए। मौजूदा उपबंध में समुदायों के प्रतिनिधित्व के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। इस उपबंध में राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधित्व की चर्चा की गई है। लेकिन यह उपबंध समुदायों को प्रतिनिधित्व दिए जाने के बारे में भी लागू हो सकता है। इस उपबंध का पाठ इस प्रकार हैः