9. संघीय संरचना समिति - Page 137

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है कि संघ की एक इकाई को संघीय विधान-मंडल के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन यह उस प्रस्ताव से बिल्कुल अलग बात है, अर्थात् यह कि सरकारों को ही सदन में अपने प्रतिनिधि नामजद करने चाहिएं। मेरे विचार से यह दो बातें बिल्कुल अगल-अलग हैं। इस प्रकार की व्यवस्था जहां मंजूर की गई और उसे संविधान में शामिल किया गया, वह पुराने जर्मनी साम्राज्य का संविधान है। इस संविधान में राज्यों की सरकारों को अपने-अपने प्रतिनिधि वहां के संघीय विधान-मंडल के उच्च सदन में भेजने की अनुमति मिली हुई थी। हो सकता है कि दूसरी ओर बैठे हुए हमारे साथी पुराने जर्मनी साम्राज्य के संविधान में की गई इस व्यवस्था के आधार पर अपना तर्क प्रस्तुत कर रहे हों। इस विषय पर आगे कहने के पूर्व मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मुझे इस बात पर शक है कि पुराने जर्मनी के साम्राज्य की इस व्यवस्था के सभी पहलुओं को हमारे राज्यों के राजा-महाराजापूरी तरह समझते भी हैं। वहां के विधान-मंडल के उच्च सदन में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि निस्संदेह राजदूत समझे जाते थे और वे निश्चित निर्देशों के अनुसार कार्य करते थे। लेकिन इस व्यवस्था में एक बड़ी बात यह थी कि इस उच्च सदन को उनका दस्तावेज जांचने का आदेश मिला हुआ था, जिन्हें हम राजदूतों के प्रत्यय-पत्र कह सकते हैं। सिर्फ यही नहीं, इस उच्च सदन को इन राज्यों के राजा-महाराजाओं से संबंधित राजवंशीय मामलों की जांच करने का भी अधिकार था। इसकी वजह यह थी कि जब तक किसी राजा-महाराजा को राजाध्यक्ष के रूप में विधिपूर्वक मान्यता मिली हो, तब तक उसके प्रतिनिधिमंडल को उच्च सदन में बैठने का अधिकार नहीं था। इस उदाहरण के आधार पर जो राजा-महाराजा अपना दावा प्रस्तुत करते हैं, उन्हें ख्. . .,

कर्नल हव्Qसरः वह ऐसा नहीं करते।

डॉ. अम्बेडकरः मुझे शक है कि हमारे राजा-महाराजा भारत के संघीय विधान-मंडल को ऐसे अधिकार देने पर सहमत होंगे, जैसे कि जर्मन संघ के उच्च सदन को प्राप्त हैं। अध्यक्ष महोदय! मैं इस सवाल पर पिछली मिसालों या समान उदाहरणों का संदर्भ देकर विचार नहीं करूंगा और मैं बिल्कुल अलग कसौटियों पर परखते हुए कहूंगा, हम सब जिस एक बात को स्पष्ट रूप से जानते हैं, वह यह है कि हम भारत में एक उत्तरदायी शासन की प्रणाली स्थापित करने के लिए संविधान बना रहे हैं। हालांकि हम और बहुत से मामलों पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन मैं इस बात को कभी नजरअंदाज नहीं कर सकता कि इस समिति का यही एकमात्र मुख्य लक्ष्य और प्रधान कार्य है। इसका यह तात्पर्य हुआ कि ऐसी कोई भी छूट नहीं दी जा सकती और न ही ऐसी कोई योजना ही स्वीकार की जा सकती है, जिससे अंततः यह पया जाए कि ऐसी छूट या योजना से उत्तरदायित्व की प्रणाली पर आंच आती है या जिससे उत्तरदायित्व की प्रणाली धीरे-धीरे कम प्रभावी होती जाती है, जिसकी स्थापना करना हम सबका ध्येय है।

अब अगर इस कसौटी को लागू किया जाए, तब आप राजा-महाराजाओं के इस दावे