संघीय ढांचा समिति
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का अनुमोदन नहीं करेंगे कि उन्हें अपने प्रतिनिधियों को नामजद करने का अधिकार है।
कर्नल हव्Qसरः किस सदन में?
डॉ. अम्बेडकरः किसी भी सदन में, पहली बात तो यह है कि संघीय संरचना उप-समिति की रिपोर्ट को जो भी पढ़ेगा, उसे यह पता चलेगा कि राजा-महाराजा न केवल विधान-मंडल में आना चाहते, बल्कि वह देश की केंद्रीय कार्यकारिणी में भी अपना प्रतिनिधित्व चाहते हैं और यह उचित भी है कि राजा-महाराजाओं का यही लक्ष्य होना चाहिए। यह इसलिए उचित है कि अगर वे सिर्फ विधान-मंडल में शामिल होते हैं, तो उन्हें कोई खास लाभ नहीं होगा। उन्हें असल में लाभ तब होगा, जब देश की कार्यकारिणी में उनकी भागीदारी हो। इसलिए इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, मेरा यह कहना है कि जैसा कि संघीय संरचना उप-समिति ने कहा है, केंद्रीय विधान-मंडल के उत्तरदायित्व की प्रणाली सामूहिक उत्तरदायित्व की प्रणाली होगी। अब जब हमारे विधान-मंडल में ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि चुनाव के माध्यम से आएंगे तथा देशी राज्यों के प्रतिनिधि इस विधान-मंडल में नामजदगी के द्वारा आएंगे और उन्हें निश्चित निर्देश उनसे मिलेंगे, जिन्होंने उन्हें नामजद किया है, तब एक बात, जो मेरी समझ में नहीं आती है, वह यह है कि सामूहिक उत्तरदायित्व की प्रणाली किस प्रकार हमारे देश के भावी संविधान में कारगर रह सकेगी, क्योंकि तब जनादेश बंटा हुआ होगा और निर्देश भी भिन्न होंगे।
संघीय विधान-मंडल में राजा-महाराजाओं के नामजद होने का असर एक दूसरे रूप में पड़ेगा। माननीय तेज बहादुर सपू्र ने कल सरकारी नामजदगी को रखे जाने की ठीक ही निंदा की। चूंकि यह वर्ग कार्यकारिणी के निदेश के अनुसार काम करेगा, इससे यह वर्ग कार्यकारिणी को विधान-मंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं होने देगा। उन्होंने सरकारी वर्ग का जिस कारण अनुमोदन नहीं किया है, मेरे, ख्याल में उनके तर्कों का यही सार है। अब मैं जो सवाल उठाना चाहता हूं, वह यह हैः क्या हमें पूरी तरह विश्वास है कि संघीय विधान-मंडल में राज्यों के प्रतिनिधि महाराजा के रूप में आचरण नहीं करेंगे? जहां तक मेरा ख्याल है और मैं इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त हूं तथा मैं यह भी कहता हूं कि मुझे ऐसा कोई विश्वास नहीं है। मैं ऐसा क्यों कहता हूं, इस बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट कर देना चाहता हूं। हम सभी जानते हैं कि राजा-महाराजा अपने-अपने राज्यों में प्रशासन जिस प्रणाली के आधार पर चलाते हैं, उसे सर्वोच्चता की प्रणाली कहा जाता है। मेरा ख्याल है कि सर्वोच्चता के सिद्धांत के पक्षों में से एक पक्ष यह है कि सर्वोच्च सत्ता को महत्वपूर्ण नियुक्तियों के मामले में राजा-महाराजाओं को सलाह देने का अधिकार होता है।
महाराजा बीकानेरः बिल्कुल नहीं। ऐसा एक या दो मामलों में हो सकता है।