संघीय ढांचा समिति
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सर्वोच्चता के सिद्धांत को लागू किया गया, तब हमें और कई परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
कर्नल हव्Qसरः आप बात को बदल रहे हैं।
डॉ. अम्बेडकरः जी नहीं, मैं ऐसा नहीं कर रहा हूं। मैं आपको संदर्भ बताऊंगा। अध्यक्ष महोदय! मैं सिर्फ एक बात और कहना चाहता हूं, हालांकि इसे मैं पहले भी कह चुका हूं, लेकिन मैं अब इसे जोर देकर कह रहा हूं। हम सभी जानते हैं कि हम सारे भारत के लिए संघीय संविधान तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। मैं जिस दूसरी बात पर जोर दे रहा हूं, वह यह है कि हम यहां सिर्फ सरकार के रूप में परिवर्तन एकात्मक सरकार से संघीय सरकार में करने की इच्छा से इकट्टòे नहीं हुए हैं।
अध्यक्षः कुछ लोग कहते हैं, जो सबसे अच्छी तरह प्रशासित हो, वही सरकार सबसे अच्छी होती है।
डॉ. अम्बेडकरः जी हां, लेकिन मेरा विचार है कि हम सभी इस बात पर एकमत हैं कि उत्तरदायी सरकार ही सबसे अच्छी तरह प्रशासित हो सकती है। इसलिए संघीय सरकार बनाने के बारे में मैं हर संभव छूट देने के लिए तैयार हूं। लेकिन मैं किसी ऐसी छूट को देने या कोई ऐसा समझौता करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हूं, जिससे हमें संघीय सरकार का केवल अस्थिपंजर प्राप्त हो और उसकी आत्मा, अर्थात् उत्तरदायी सरकार उसमें से नदारद हो।
सच तो यह है कि मेरी समझ में यह नहीं आता कि राजा-महाराजा चुनाव के सिद्धांत का विरोध क्यों करते हैं? पुराने जर्मन साम्राज्य में भी वहां के राज्यों ने यह स्वीकार कर लिया था कि निचले सदन (रीशताग) का गठन राज्यों की जनता द्वारा चुने हुए लोगों से होना चाहिए, जहां संघीय इकाइयों की अपनी-अपनी सरकारों का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार को स्वीकार कर लिया गया था। इसलिए मैं उनकी आपत्ति को समझ नहीं पा रहा हूं, क्योंकि इन देशी राज्यों की संघीय विधान सभा का गठन वहां की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा होगा, जिसका तात्पर्य यह है कि उनके राज्य विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में बंट जाएंगे। अगर हम यह कहते हैं कि राज्यों में विधान-मंडल होने चाहिएं, जो उनके प्रशासन पर नियंत्रण रखेंगे, तब उनकी आपत्ति को मैं समझ सकता था। लेकिन हम तो ऐसी कोई बात नहीं कह रहे हैं। हम तो सिर्फ इतना कह रहे हैं कि कृपया हमें अपने राज्यों को चुनाव-क्षेत्र में बांटने की अनुमति दीजिए और आप अपनी जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने दीजिए जो जहां संघीय विधान-मंडल में बैठेंगे और मत दिया करेंगे। ये प्रतिनिधि आपके विशेष मामलों के बारे में निर्णय नहीं करेंगे, वे आपके राज्य के मामलों में दखल नहीं देंगे, बल्कि समूचे भारत से संबंधित मामलों पर विचार किया करेंगे। इसलिए देशी राज्यों की दृष्टि से क्या आपत्ति हो सकती है? इसे मैं ठीक ढंग से समझ नहीं पा रहा हूं।
माननीय मानेकजी दादाभाईः और छोटे राज्यों में भी?