9. संघीय संरचना समिति - Page 141

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डॉ. अम्बेडकरः अगर वे मेरे इस दृष्टिकोण से, जो मैं विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं, सहमत हैं कि संघीय विधान-मंडल के लिए चुनाव कराने से उनके अपने प्रशासन में कोई अड़चन नहीं आएगी, उनको अपने राज्य का कोई नुकसान नहीं होगा, तब मेरा निवेदन है कि जहां तक निचले सदन में राज्यों के प्रतिनिधित्व की समस्या है, उसे सुलझाना आसान हो जाएगा। सिर्फ उच्च सदन में राज्यों के प्रतिनिधित्व का सवाल रह जाता है। अगर यह सवाल ऐसे तरीके से सुलझाना है कि जिसमें राज्यों द्वारा नामजद करने की बात न हो, तब मैं दो विकल्प प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हूं। पहला विकल्प मैं यह प्रस्तुत कर रहा हूं कि आप नारवेयाई प्रणाली को स्वीकार करे ले। इस प्रणाली में एक सदन चुने हुए प्रतिनिधियों का होता है, ये प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने जाते हैं। यहां यह सदन अपने ही सदस्यों में से एक-दूसरे सदन के लिए सदस्य चुनता है। इससे उच्च सदन में राज्यों द्वारा प्रतिनिधि नामजद करने की समस्या से बच सकते हैं। या अगर यह स्वीकार न हो, तब एक दूसरा तरीका है, जो मेरा ख्याल है कि जो प्रस्तावित किया जा सकता है। वह यह है कि राजा-महाराजा अभ्यर्थियों की सूची दें और इस सूची में से संघीय विधान-मंडल के लिए प्रतिनिधि चुने जा सकते हैं।

महाराजा बीकानेरः यह चुनाव कौन करेगा?

डॉ. अम्बेडकरः यह चुनाव निचले सदन द्वारा किया जाएगा। लेकिन जो भी हो, मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि जहां तक मेरा अपना कहना है कि मैं किसी ऐसी प्रणाली को अपनाए जाने के पक्ष में नहीं हूं, जिसमें राज्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामजद करने की बात होगी।

अब, अध्यक्ष महोदय! मैं विचारार्थ विषय-सूची की एक दूसरी मद पर चर्चा करूंगा। यह मद है, विशेष हितों के क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व।

अध्यक्षः यह संख्या 5 है - विशेष हितों के विशेष निर्वाचन-मंडल के लिए प्रावधान।

डॉ. अम्बेडकरः पहली बात मैं यहां स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं नहीं चाहता कि दलित वर्ग को विशेष हित की श्रेणी में रखा जाए। मैं चाहता हूं कि राजनीतिक कार्यों के लिए दलित वर्ग उसी तरह एक पृथक वर्ग समझा जाए, जिस तरह मुसलमानों या ईसाइयों को समझा जाता है और न केवल प्रांतीय विधान सभाओं, बल्कि केंद्रीय विधान-मंडल के दोनों सदनों में भी प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के समान अधिकार प्राप्त होने चाहिएं।

अध्यक्षः जब आप समान अधिकार की बात करते हैं, तब क्या आपका आशय यह है कि उनकी संख्या भी उतनी ही होनी चाहिए, जितनी कि अन्य की है?

डॉ. अम्बेडकरः जी नहीं। उन्हें जितनी संख्या में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का अधिकार होगा, वह उसी सिद्धांत के अनुसार होना चाहिए, जो सभी लोगों के लिए अपनाया जाएगा।