संघीय ढांचा समिति
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अध्यक्षः आपने भी यही बात कही। धन्यवाद।
डॉ. अम्बेडकरः अब मैं अन्य हितों की चर्चा करूंगा, जिन्हें अब तक मान्यता मिल चुकी है, वे हैं, व्यापार, वाणिज्य, भूमिपति और विश्वविद्यालय।
डॉ. शफाअत अहमद खांः विश्वविद्यालय नहीं?
डॉ. अम्बेडकरः नहीं, विश्वविद्यालय नहीं हैं, मैं इन विशेष हितों को प्रतिनिधित्व दिए जाने का समर्थन नहीं करता। पहली बात तो यह है कि, उदाहरण के लिए, मैं नहीं समझता कि भूमिपतियों को विशेष प्रतिनिधित्व क्यों चाहिए? मुझे नहीं मालूम कि वह कौन-सी दिक्कतें और कमियां हैं, जिनके कारण कोई भूमिपति साधारण चुनाव प्रक्रिया से बाहर रहे और अपने वर्ग के लोगों के लिए मताधिकार प्राप्त करे। इसके लिए उसे कोई रुकावट नहीं है। मुझे विश्वास है कि बाहर सभी देशों में, उदाहरण के लिए, इंग्लैंड में और यूरोप के देशों में व्यापार, वाणिज्य और भूमिपतियों जैसे वर्गों के लिए कोई विशेष प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। उन्हें आम लोगों के साथ चुनाव लड़ना पड़ता है। मेरा विचार है कि यही व्यवस्था भारत में अपनाई जानी चाहिए। इन वर्गों के लिए कोई विशेष प्रतिनिधित्व देने के बारे में मेरी और भी कई आपत्तियां हैं। सबसे पहली यह है कि इन वर्गों के लोगों की संख्या बहुत थोड़ी है, इसलिए इनका निर्वाचन-मंडल अत्यंत संकीर्ण होगा। यह एक गुट जैसा है। अब अगर उन्हें उन्हीं विषयों पर मत देना है, जो उनसे संबंधित हैं, तब क्षेत्र तुलनात्मक दृष्टि से छोटा होगा। लेकिन अगर ये लोग इस तरह सिर्फ सीमित निर्वाचन-क्षेत्र से विधान परिषद में नहीं आते, तब वे उन सभी मामलों पर मत दे सकेंगे, जो विधान सभा के सम्मुख आएंगे। मैंने बंबई विधान परिषद में जो बातें देखी हैं, उनमे एक यह है कि वहां व्यापार और वाणिज्य के लिए निर्वाचन-क्षेत्र बने हुए हैं। अब बंबई प्रेसिडेंसी में व्यापार और वाणिज्य-क्षेत्र में एक खास समुदाय का एकाधिकार है, जिसके बारे में मुझे यह कहते हुए खेद हो रहा है कि यह समुदाय उन सभी समुदायों में, जो अभी तक मेरी जानकारी में हैं, सबसे अधिक कट्टठ्ठरपंथी समुदाय है।
श्री जयकरः राजनीतिक दृष्टि से?
डॉ. अम्बेडकरः सामाजिक दृष्टि से। अब ऐसे सदस्यों को विधान परिषद में आने के लिए आसानी से निर्वाचन-क्षेत्र मिल जाते हैं। अब, अगर कोई प्रगतिशील कदम उठाया जाता है, तब यह लोग कट्टठ्ठरपंथियों के साथ मिल जाएंगे, उनका साथ देंगे और इस तरह स्वतंत्रता और प्रगति के लक्ष्यों के आड़े आएंगे। इसलिए मैं इसका विरोध करता हूं। अगर इस तरह का कोई प्रावधान किया जाता है, तब मैं यह रियायत दूंगा कि जब कभी किसी ऐसे विधेयक पर विचार हो रहा होगा, जिससे उनके हित पर असर पड़ने वाला होगा, तब उन्हें विधान सभा या उच्च सदन में अपनी बात कहने का पूरा-पूरा अधिकार होगा। उन्हें अपनी बात कहने का मौका दिया जाएगा लेकिन उन्हें विधान-मंडल का सदस्य बनाने या उन्हें किसी भी विधेयक पर विधान-मंडल में मत देने का अधिकार