9. संघीय संरचना समिति - Page 143

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दिए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

यही बात मैं श्रमिकों के बारे में भी कहूंगा। मुझे नहीं मालूम कि श्री जोशी मेरे दृष्टिकोण से सहमत हैं या नहीं। लेकिन मेरा अपना विचार यह है कि यदि प्रौढ़ मताधिकार की प्रणाली लागू होती है - और मुझे आशा है कि महात्मा गांधी की सहायता और उनके समर्थन से हम इसे इस सम्मेलन में स्वीकार कर लेंगे - तब श्रमिकों को विशेष प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन अगर हम प्रतिनिधित्व की कोई ऐसी प्रणाली शुरू करते हैं, जिसमें श्रमिकों का विशाल समुदाय विधान से बाहर रहता है और वे सरकार पर नियंत्रण नहीं रख सकते तथा अपनी खुशहाली व उन्नति के लिए सरकार से कोई काम नहीं करवा सकते, तब श्रमिकों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व देने की अवश्य जरूरत होगी और मेरा विचार है कि विभिन्न संघ को संगठित कर और उनको प्रतिनिधित्व के लिए उनके निर्वाचन-क्षेत्र बनाकर हम ऐसा भी कर सकते हैं।

अगला विषय, जो मैं उठा रहा हूं, वह नामजद सदस्यों के बारे में है। हालांकि मैं निश्चित नहीं हूं, लेकिन मेरा ख्याल है कि संघीय विधान-मंडल में नामजद सदस्यों का एक वर्ग बनाने के पीछे लक्ष्य यह है कि सिद्धांत रूप में ऐसे विषयों को समर्थन दिया जा सके, जिन्हें राज्य के विषय या जिन्हें प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली के अंतर्गत, आरक्षित विषय कहा जाता है। पहली बात तो यह है कि मैं स्पष्ट कर दूं कि नामजद सरकारी सदस्यों से मुझे बड़ा भय लगता है और इस बारे में मेरी शंकाएं भी हैं। मेरे विचार में अगर कोई ऐसी संस्था है, जिसने प्रांतीय सरकारों में उत्तरदायित्व की प्रणाली को नष्ट किया है, जो मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत लागू की गई थी, तो वह यही नामजद सदस्यों का वर्ग है। यही है जिसने सारी प्रणाली को दूषित कर दिया। यही वर्ग है, जिसने प्रांतों में बहुसंख्यक के बजाए अल्पसंख्यकों के शासन को संभव कर दिखाया। यही वर्ग है, जिसने हर तरह के लोगों और वर्गों के साथ साठ-गांठ की, ये वे वर्ग नहीं थे जिन्हें इस वर्ग की सहायता या समर्थन जरूरी था, बल्कि ये वे वर्ग थे, जो छोटे से छोटे लाभ के लिए अपने को बेचने के लिए तैयार रहते थे। मैं इस नामजद सदस्य प्रणाली का घोर विरोध करता हूं।

मेरा निवेदन है कि ऐसे विषयों को जिन्हें राज्य विषय कहा जाता है, समर्थन देने के लिए इस नामजद सरकारी सदस्य व्यवस्था की असल में कोई जरूरत नहीं है। प्रांतीय संविधान में जहां इस समय आरक्षित विषय की व्यवस्था है, इन आरक्षित विषयों को समर्थन देने और इनकी रक्षा करने के लिए बहुत से उपाय हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि अनुच्छेद 72-घ के तहत हमारे यहां ये विषय एक ऐसे व्यक्ति के अधिकार में रहते हैं, जिसको हटाया नहीं जा सकता और न ही जिसके बारे में मतदान किया जा सकता है। दूसरे, गवर्नर को ऐसे खर्च को प्रमाणित करने का अधिकार प्राप्त है, जिसे वह आरक्षित विषयों की रक्षा करने के लिए आवश्यक समझता है। तीसरे, गवर्नर को ऐसे बिलों को प्रमाणित करने का भी अधिकार प्राप्त है, जिन्हें वह आरक्षित विषयों