130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पंडित मदन मोहन मालवीयः महोदय! मैं ऐसा ही सोचता हूं। क्या ही अच्छा होगा कि अगर मैं आपकी किसी बात को रूपकों की सहायता से प्रस्तुत करने का तरीका सीख लेता। (पंडित मालवीय ने आगे यह सुझाव दिया कि प्रतिनिधित्व का सिद्धांत लागू करने का मामला राजा-महाराजाओं की इच्छा पर छोड़ दिया जाए। अगर वे इसे स्वेच्छा से लागू करते हैं, तो उन्हें खुशी होगी) उन्होंने अपना भाषण समाप्त करते हुए कहा - लेकिन तब ब्रिटिश भारत के अपने मित्रों को मेरी यह राय है कि हम धैर्य रखें और शिष्टाचार बनाए रखें, हमें आशा है कि उचित समय आने पर ऐसी संस्थाएं स्थापित हो जाएंगी, और हमें कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए, जिससे अखिल भारतीय संघ की स्थापना में अनावश्यक रूप से कोई अड़चन आए, क्योंकि जैसी स्थिति इस समय है, उस पर हमारी आशा भी निर्भर करती है।
डॉ. अम्बेडकरः ऐसी ही सलाह दलित वर्गों को दी जाती है कि उन्हें अपनी मुक्ति भी समय आने पर प्राप्त होगी।
पंडित मदन मोहन मालवीयः महोदय! मेरे मित्र डॉ. अम्बेडकर ने बिल्कुल गलत समझा। मुझे दुःख है कि उनको उतनी अधिक जानकारी नहीं है, जितनी कि मैं समझता था कि उनको होगी।
डॉ. अम्बेडकरः मैं और जानकारी प्राप्त करना चाहता हूं।
पंडित मदन मोहन मालवीयः मैं यह नहीं कहता कि दलित वर्ग को प्रतीक्षा करनी चाहिए। मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड प्रस्तावों की आलोचना करते समय जब इन सुधारों की 1918 में पहले पहल घोषणा हुई थी, तब मैंने यह आलोचना प्रकाशित भी की थी - मैंने यह निवेदन किया था कि जहां तक दलित वर्ग का प्रश्न है, यह सवाल खास तौर से शिक्षा का प्रश्न है और मैंने यह कहा था और जिसे मैं अब भी कहता हूं, कांग्रेस भी यही कहती है कि सार्वजनिक रूप से प्राइमरी शिक्षा होनी चाहिए। जब से कांग्रेस स्थापित हुई है, तब से ही वह यह वर्षों से कहती आई है और अगर भारत की सरकार ने जिसके अधीन देश के सारे संसाधन हैं, जनता में प्राइमरी शिक्षा के प्रसार पर पर्याप्त धन व्यय किया होता, तब ‘दलित वर्ग’ जैसा शब्द अब तक इतिहास बन गया होता - आज से कई वर्ष पहले। हम यह चाहते हैं कि उन्हें प्रारंभिक शिक्षा मिले, प्राइमरी शिक्षा मिले, उन्हें सैकेंडरी शिक्षा मिले, उन्हें ऊंची से ऊंची शिक्षा मिले। मुझे एक विश्वविद्यालय - काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति होने का गौरव प्राप्त है और वहां दलित वर्ग के विद्यार्थी को वही स्थान दिया जाता है, जो किसी और वर्ग के विद्यार्थी को दिया जाता है। वहां कोई भेद नहीं है और जिन्हें शिक्षा प्राप्त होती है, वे अपनी प्रतिभा का अच्छा प्रदर्शन करते हैं। मैं कहूंगा कि मेरे मित्र डॉ. अम्बेडकर ने इसे सिद्ध भी कर दिया है।
डॉ. अम्बेडकरः मैं समाज में आज भी ‘अस्पृश्य’ हूं, हालांकि पढ़ा-लिखा हूं। मेरी शिक्षा मुझे इससे बाहर नहीं निकाल सकी।