संघीय ढांचा समिति
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पंडित मदन मोहन मालवीयः क्षमा कीजिए, आप अस्पृश्य नहीं हैं, आप एक प्रिय मित्र हैं और एक प्रिय साथी हैं, एक ऐसे भाई जिसके साथ आपके कट्टठ्ठर से कट्टठ्ठर मित्रों को रहने और काम करने से सुख मिलता है और आप जानते हैं कि वह आपके साथ काम भी करते हैं। आज दलित वर्ग के लोगों के हित के लिए अधिकतर ब्राह्मण कार्य कर रहे हैं। मैं सोचता हूं कि यह एक वास्तविक बात है, इसे मेरे मित्र डॉ. अम्बेडकर स्वीकार करेंगे।
जिस एक अलग विषय पर मैं कुछ कहना चाहता हूं, वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव है। मैं इस बात से शंकित हूं कि इस बारे में गांधी जी ने जो कुछ कल कहा, उसे प्रायः ठीक ढंग से नहीं समझा गया ख्. . ., उन्होंने लॉर्ड पील के सुझाव का अनुमोदन करते हुए, जो कुछ कहा, उसे जैसा मैंने समझा, वह यह था कि वह यह बताना चाहते थे कि लोग यह अनुभव करते हैं कि देश में सभी प्रौढ़ लोगों को मताधिकार देने में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां हैं ख्. . ., गांधी जी ने उस योजना का जब सुझाव दिया, तब निश्चय ही प्रौढ़ मताधिकार को शुरू करने की बात कही गई थी। उन्होंने इस विचार का अनुमोदन नहीं किया था कि अप्रत्यक्ष चुनाव पद्धति लागू की जानी चाहिए, जिससे जनता यह समझे कि मत देने के अधिकार से उसे वंचित रखा गया है।
माननीय तेज बहादुर सपू्रः मैंने प्रौढ़ मताधिकार के सिद्धांत की व्याख्या को जैसी कि गांधी जी ने की, बड़े ध्यान और रुचि से सुना। लेकिन मेरा ख्याल है कि यह उन सुझावों से हल्की पड़ती है, जो नेहरू रिपोर्ट में दिए गए हैं। अगर मैं गलती पर होऊं, तो कृपया मेरी गलती को सुधार दें।
माननीय सेम्युअल होरः पंडित मालवीय! फिर भी यह प्रत्यक्ष चुनाव है। आप प्रौढ़ मताधिकार के समर्थन में तर्क दे रहे हैं। समिति जिस विषय पर कल विचार कर रही थी, वह यह विषय नहीं था। मैंने यही समझा है। वह तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव के विकल्प की बात थी और जैसा कि मैंने महात्मा गांधी के भाषण को समझा, वह प्रौढ़ मताधिकार के पक्ष में थे। लेकिन वह अप्रत्यक्ष चुनाव के पक्ष में भी थे।
कर्नल हव्Qसरऽः ख्. . ., मैं इस विषय पर आगे कुछ कहना जरूरी नहीं समझता। लेकिन मैं मालवीय जी के शब्दों को सिर्फ दोहराना चाहता हूं। उन्होंने जो कुछ कहा, उसे अगर मैं संक्षिप्त में कहूं, तो वह यह थाः विचार करने की सबसे मुख्य और अहम् बात यह है कि हमें भारत में एक राज्य बनाना है, जिसमें कोई भी भाग राज्य से बाहर नहीं रहे। अगर यही बात अहम् है तब मेरा कहना है कि यह लक्ष्य हर कीमत पर प्राप्त किया जाना चाहिए और ऐसी कोई बात मंजूर नहीं की जानी चाहिए, जो इस लक्ष्य को प्राप्त करने में आड़े आती है।
डॉ. अम्बेडकरः किसी भी कीमत पर नहीं - हमारे हितों की कीमत पर नहीं।
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी एंड माइनॉरिटीज कमेटी, खंड 1, पृ. 205