132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
छब्बीसवीं बैठक - 21 सितंबर, 1931
मद संख्या 3
(संघीय विधान-मंडल के दोनों सदनों के बीच संबंध)
डॉ. अम्बेडकरऽः मैं इस अवसर पर दखल तो नहीं दे रहा हूं, लेकिन मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। माननीय तेज बहादुर सपू्र ने कहा कि पूर्ति के मामले में या आमतौर पर वित्तीय विधेयक के मामले में उच्च सदन को यह अधिकार होना चाहिए कि वह निचले सदन से सुझाव देने और उस पर विचार करने के लिए कह सके। लेकिन अगर निचला सदन उसके सुझावों को स्वीकार न करे, तब क्या होगा?
माननीय तेज बहादुर सपू्रः तब उच्च सदन विधेयक को अस्वीकृत करने के लिए स्वतंत्र होगा। लेकिन ऐसा कोई गतिरोध आता है, तब आप दक्षिण अफ्रीका का उदाहरण अपना सकते हैं और उसकी प्रक्रिया को लागू कर सकते हैं।
डॉ. अम्बेडकरः अगर उच्च सदन को विधेयक वापस भेजे या सुझाव देने का अधिकार होगा, तब गतिरोध कैसे पैदा हो सकता है?
माननीय तेज बहादुर सपू्रः तब वह विधेयक को बिल्कुल ही अस्वीकृत कर सकता है।
माननीय मोहम्मद शफीः तब इसमें, अर्थात् संशोधन जो निचले सदन को भेजा जाता है और निचले सदन को भेजे जाने वाले सुझाव में क्या मौलिक भेद है, जिसे उसे अस्वीकृत करने की शक्ति मिली हुई है? इन दोनों में मौलिक भेद क्या है?
माननीय तेज बहादुर सपू्रः पहली बात यह है कि यह आधुनिक पद्धति से मेल
खाता है।
डॉ. अम्बेडकरः आपके सुझाव के मुताबिक वित्त विधेयक और दूसरे विधेयकों में सिवाए इसके कोई मौलिक भेद नहीं होगा कि वित्त विधेयक को प्रस्तुत करने का अधिकार सिर्फ निचले सदन को होगा। बाकी सभी मामलों में दोनों सदन बराबरी पर होंगे?
माननीय तेज बहादुर सपू्रः असल में मैंने यही बात कही है।
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श्री जफरुल्ला खांऽऽः इसलिए मेरा सुझाव है कि प्रस्तावित कुल संख्या को ध्यान में रखते हुए - हालांकि मुझे यह नहीं मालूम कि तुलनात्मक कुल संख्या रखी भी जा सकेगी - अब तक जो विचार प्रस्तुत किए गए हैं, उनके अनुसार स्थिति यह हुई कि अपेक्षित बहुमत का अर्थ दोनों सदनों में सदस्यों की कुल संख्या का साधारण बहुमत
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी एंड माइनॉरिटीज कमेटी, खंड 1, पृ. 207
ऽऽ वही, पृ. 242