138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
महाराजा बीकानेरः मैं ब्रिटिश साम्राज्य के अभिज्ञात सभासदों के प्रति पूर्ण सम्मान के साथ निवेदन करना चाहता हूं कि हमारे राज्य हर ऐसे क्षेत्र में पूर्ण प्रभुतासम्पन्न हैं, जो ब्रिटिश क्षेत्र नहीं हैं, जब कि इस साम्राज्य के सबसे महत्वपूर्ण सभासद और उनके अधिकार क्षेत्र की स्थिति बिल्कुल ही भिन्न है।
डॉ. अम्बेडकरः यह प्रभुता हाउस ऑफ लॉर्ड्स के प्रस्ताव क्षेत्र और शक्ति पर निर्भर करती है।
माननीय मोहम्मद शफीः क्या मैं डॉ. अम्बेडकर से यह पूछ सकता हूं कि हाउस ऑफ लॉर्ड्स के विशेषाधिकार क्या हैं?
डॉ. अम्बेडकरः अपनी बात स्पष्ट करने के बाद मैं जिस अगली बात पर आना चाहता हूं, वह यह है कि संविधान में वित्त विधेयक की परिभाषा का उल्लेख होना चाहिए। इसकी परिभाषा, जैसा कि सुझाव दिया गया है, ऐसी हो जानी चाहिए, जैसी कि आयरलैंड के संविधान में दी गई है और जो उस परिभाषा से भिन्न नहीं है, जैसा कि 1911 के पार्लियामेंट ऐक्ट में लिखा हुआ है।
मैं अगली बात जो इसी से संबंधित है, यह कहना चाहता हूं कि जो सदस्य किसी भी विधेयक का प्रभारी हो, उसे यह दावा करने का अधिकार मिलना चाहिए कि उसका विधेयक एक वित्त विधेयक है। अगर दोनों सदनों के बीच ऐसा कोई विवाद हो कि कोई विधेयक जिसे वित्त विधेयक कहा जा रहा है, विधेयक नहीं है, तब इस विवाद का निर्णय दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति द्वारा किया जाना चाहिए, जिसमें प्रत्येक सदन के प्रतिनिधि उसकी कुल संख्या के अनुपात में रखे जाने चाहिएं और जिसमें सभी पार्टियों के प्रतिनिधि भी उनकी अपनी कुल संख्या के आधार पर होने चाहिए।
माननीय मानकजी दादाभाईः आप मौजूदा पद्धति से भिन्न पद्धति चाहते हैं।
डॉ. अम्बेडकरः कुछ ऐसा ही है।
श्री अम्बेडकरः अगर मौजूदा पद्धति संतोषजनक होती, तब हम यहां न होते।
डॉ. जफरुल्ला खांः अगला विषय जो मैं ले रहा हूं, वह गैर-वित्तीय विधेयक हैं। गैर-वित्तीय विधेयकों के मामले में मैं वित्त विधेयक के संबंध में लागू होने वाले सिद्धांत में संशोधन करने के लिए तैयार हूं, लेकिन सिर्फ दो प्रयोजनों के लिए। पहला, जो गैर-वित्त विधेयक निचले सदन द्वारा लाया जाएगा, उसमें उच्च सदन को पुनरीक्षण और संशोधन करने का अधिकार होगा, बशर्ते उच्च सदन द्वारा ऐसा कोई भी संशोधन नहीं किया जाएगा, जो वित्तीय मामलों से संबंधित होगा। दूसरा, उच्च सदन को किसी गैर-वित्तीय विधेयक को रोके रखने और उस विधेयक को पारित होने तक जिसके बाद वह कानून बन जाता है, इतनी देर करने का अधिकार होगा, जिससे कोई जल्दबाजी या जितनी देरी इसलिए जरूरी हो कि उसके बारे में जनता का दृष्टिकोण पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त न हो जाए। इस बात को ध्यान में रखते हुए, गैर-वित्तीय विधेयकों से संबंधित उपशीर्ष में प्रस्तावित प्रश्न का मेरा उत्तर यह है कि उच्च सदन को गैर-वित्तीय विधेयक