संघीय ढांचा समिति
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लाजिमी बात है। जब तक मैं उन लोगों का दृष्टिकोण इस बारे में निश्चित रूप से न समझ लूं, तब तक मेरे लिए इस बारे में कुछ कहना कठिन है। अगर आप चाहते हैं कि इस प्रश्न का उत्तर मैं दूं, तो मेरा उत्तर यह है कि संघीय संविधान लागू करने के लिए हमें किसी नियत संख्या में भारतीय राज्यों के शामिल होने का इंतजार नहीं करना चाहिए। मैं नहीं कह सकता कि ब्रिटिश भारत में रहने वाला कोई भी व्यक्ति उत्तरदायी सरकार की स्थापना के प्रश्न को तब तक बस्ते में बंद कर रखे रहेगा, जब तक राजा-महाराजा भारत की संघीय सरकार में शामिल होने का निर्णय नहीं कर लेते हैं। इसलिए भारत में संघीय सरकार शुरू करने के बारे में जो कुछ हमें करना है, वह यह है कि हम संविधान में एक धारा यह जोड़ दें कि महामहिम की सरकार अपने आदेश से नए-नए राज्यों को जैसे-जैसे वह शामिल होने की इच्छा करेंगे, संघ में शामिल कर लिया करेगी। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसी व्यवस्था कनाडा के संविधान में धारा 146 और 147 में और ऑस्ट्रेलिया के संविधान की धारा 121 से 124 में की हुई है। कनाडा के संविधान की धारा 146 में यह प्रावधान है कि 1867 में संघ के गठन के समय, जो इकाइयां इसमें शामिल नहीं हुई थीं और जो बाद में इसमें शामिल होने की इच्छुक हुईं, उन्हें महामहिम की सरकार ने संविधान की इकाई के रूप में शामिल कर लिया था। मेरा ख्याल है कि अगर इस तरह की कोई धारा जोड़ दें, तब संघीय संविधान कार्यान्वित करने का हमारा उद्देश्य पूरा हो जाता है। यह राजा-महाराजाओं की स्वतंत्रता के अनुरूप रहेगा कि वे संघ में शामिल होना चाहते हैं या नहीं।
अब आइए उप-मद (5) के भाग (क) पर विचार करें। इस बारे में महाराजा बीकानेर का यह सुझाव हमें मिला है कि संघ में चाहे एक या सभी राज्य शामिल हों, उन्हें उनके सारे मतों का अधिकार मिला होना चाहिए, जो उनके लिए नियत किए गए हैं। अत्यंत विनम्रतापूर्वक, मेरा निवेदन है कि मेरे ख्याल से यह प्रस्ताव एक अजीब-सा प्रस्ताव है। यह एक ऐसा प्रस्ताव है, जिसके बारे में मैं आदरपूर्वक यह कहूंगा कि यह एक निरर्थक प्रस्ताव है। इस प्रस्ताव के बारे में जिसे मैं असाधारण कहना चाहता हूं, कोई औचित्य नहीं बताया गया है। इसका तात्पर्य क्या है? इसका अर्थ यह है कि अगर एक भी महाराजा संघ में शामिल होता है और विधान-मंडल में भाग लेता है, तब उसका एक मत संख्या के लिए सारे राज्यों के मतों के बराबर गिना जाएगा और ब्रिटिश भारत के निवासियों को, जो संघ में शामिल होंगे, ऐसा कोई भी निर्णय लेने का अधिकार नहीं होगा, जिससे उन राज्यों में रहने वाले लोगों का भाग्य प्रभावित हो सके, जिन्होंने इसमें शामिल होने का निर्णय नहीं किया है। यह एक अजीब एक-तरफा व्यवस्था होगी। जो महाराजा इस विधान-मंडल से बाहर रहता है, वह इस प्रावधान के अधीन अपना मत प्राप्त कर सकेगा और अपने पड़ोसी महाराजा या सहयोगी को उसे अंतरित भी कर सकेगा, जिससे वह महाराजा या सहयोगी ब्रिटिश भारत के भाग्य का फैसला कर सके। मेरा निवेदन है कि यह न्याय रहित है और इसमें कोई औचित्य नहीं है। जहां तक मेरा संबंध है, यह ऐसी बात है कि मैं इसकी सहमति कभी भी नहीं दे सकता। सबसे सही