144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रहा। यही नहीं, अमरीका ने प्रत्यक्ष कर 1864 में और 1894 में भी लगाया था। तब केंद्रीय सरकार पूरी तरह से ‘अप्रत्यक्ष’ साधनों पर निर्भर थी और कैंटनों को ‘प्रत्यक्ष’ कर लगाने का अधिकार था। मैं इस बात की कल्पना नहीं करूंगा कि इस समिति का कोई सदस्य भारतीय संघ राज्यों के लिए स्विट्जरलैंड के अनुभव से कोई सीख उद्धृत करने का साहस भी करेगा। इस तरह की तुलना से कोई लाभ नहीं होगा। यह तुलना तो पनीर के साथ सफेद खडि़या मिट्टठ्ठी के ढेले की तुलना करना जैसा होगा और वहां भी स्विट्जरलैंड के संविधान ने इस व्यवस्था को 1915 में त्याग दिया था और केंद्रीय सरकार को राज्य के नागरिकों पर ‘प्रत्यक्ष’ कर लगाने की अनुमति दे दी थी। इसलिए अगर यह प्रस्ताव उस विशेषज्ञ समिति को एक निर्देश के रूप में है, तब मैं इस प्रस्ताव के बारे में अपनी सहमति नहीं दे सकता।
अब मैं इन संसाधनों के वास्तविक विभाजन के बारे में कुछ कहूंगा, जो उप-समिति ने पैरा 10 में प्रस्तावित किया है। इस आवंटन के बारे में एक ही कसौटी अपनाई जा सकती है और वह है पर्याप्तता की कसौटी। केंद्रीय सरकार और संघ राज्य की इकाइयों, दोनों के लिए, जो आवंटन पैरा 10 में दर्शाया गया है, क्या उससे उन्हें पर्याप्त राजस्व प्राप्त होता है? अब इस विभाजन को इस कसौटी से भी परखना संभव नहीं है। मैं उप-समिति की कोई अवमानना नहीं कर रहा हूं, किंतु यह कहना चाहता हूं कि इस रिपोर्ट में आवश्यक बजट अनुमान नहीं दिए गए हैं, जिसके आधार पर कोई यह पूर्वानुमान कर सके कि यह आवंटन पर्याप्त है अथवा नहीं। यह विभाजन इस अनुमान पर आधारित हुआ लगता है कि कल्याणकारी कार्यों का संबंध अधिकतर प्रांतीय होता है, इसलिए प्रांतों को राजस्व के ऐसे संसाधन प्राप्त होने चाहिएं, जिनमें निरंतर विस्तार होता रहे। यह मुख्यतः सच भी है। लेकिन ऐसा प्रावधान करते समय, मुझे ऐसा लगता है कि उन्होंने वित्तीय प्रणाली में संघ सरकार को राजस्व के पर्याप्त और विकासशील साधनों से वंचित कर दिया है।
इस उप-समिति की रिपोर्ट के पैरा 10 को लीजिए, जो प्रस्तावों का राजस्व पक्ष है। सबसे पहले राजस्व का स्रोत सीमा-शुल्क बताया गया है। अब ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिन पर सीमा-शुल्क का राजस्व निर्भर करता है। पहली बात तो यह है कि यह व्यापार में उन्नति या व्यापार में अवनति पर निर्भर करता है। जब अवनति होती है, तब निर्यात भी घट जाता है, जनता की उपयोग शक्ति भी कम हो जाती है और इस सीमा तक आयात भी कम हा जाता है। इसका अर्थ है, सीमा-शुल्क के राजस्व में कमी। दूसरे, राजस्व का यह स्रोत आमतौर पर टैरिफ की उस नीति पर निर्भर करता है, जो आगे आने वाले वर्षों में अपनाई जाएगी। हो सकता है कि भारत में ऐसी पार्टी सत्ता में आ जाए, जो पूर्ण संरक्षण पर विश्वास करती है और इस प्रकार बाहर से किसी भी ऐसी वस्तु के आयात पर रोक लगा देती है, जो देश मैं बन रही वस्तु और उसके उद्योग से होड़ लगाती हो। अगर ऐसा होता है, अर्थात् अगर घोर संरक्षणवाद की नीति के द्वारा आयात