9. संघीय संरचना समिति - Page 163

146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करने होंगे, जो मेरे विचार में भारत के लिए विशेष प्रकार के होंगे। मैं सोचता हूं और मैं इसका प्रस्ताव अन्यत्र भी करूंगा, कि केंद्र में स्थित सरकार को उन लोगों के लिए जिन्हें हम दलित वर्ग कहते हैं, सुरक्षा और सहायता करने का उत्तरदायित्व लेना चाहिए। मैं चाहता हूं कि दलित वर्ग की समस्या और छुआछूत दूर करने की समस्या पर अब सिर्फ स्थानीय या प्रांतीय समस्या के रूप में विचार न किया जाए। मैं चाहता हूं कि इस समस्या को राष्ट्रीय समस्या समझा जाए, जिसके बारे में सारा भारत चिंतित है। मैं चाहता हूं कि केंद्र में स्थित सरकार जंगलों में रहने वाली जनजातियों को सभ्यता की धारा में शामिल करने का दायित्व स्वीकार करे, जिनकी संख्या दलित वर्ग के लोगों के लगभग बराबर ही है। मैं चाहता हूं कि सरकार उस वर्ग के लिए भी कुछ करने का दायित्व ले, जिन्हें ‘पिछड़ा वर्ग’ कहा जाता है। दूसरे शब्दों में मेरा निवेदन है कि केंद्रीय सरकार इस प्रकार के कल्याण कार्य करे, जिससे हर व्यक्ति को और हर समुदाय को इतना सभ्य जीवन तो मिल सके, जिसे मैं न्यूनतम कहता हूं।

इसके अलावा, ऐसे भी बहुत से कार्य हैं, जिनका संबंध सारे भारत से है या जिनका संबंध किसी एक प्रांत से है और जिन्हें करना उस प्रांत की क्षमता से बाहर की बात है। उदाहरण के लिए, मलेरिया प्रकोप लीजिए। कुछ प्रांतों में इसका असर कम है। लेकिन कुछ प्रांतों में मुझे बताया गया है कि यह जनशक्ति को समाप्त करता जा रहा है। वह प्रांत इसका उन्मूलन करने में आर्थिक या वित्तीय दृष्टि से समर्थ नहीं है। इसे एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में लिया जाना चाहिए और इस कारण राष्ट्रीय सरकार को अपने ऊपर कुछ कल्याणकारी कार्य करने का उत्तरदायित्व लेना होगा।

लगता है कि इस उप-समिति ने इस बात का भी ख्याल नहीं रखा है कि संघीय सरकार उन कारणों को छोड़कर जो सभी प्रांतों में समान हैं, कुछ विशेष कारणों से, जैसे उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत को, आर्थिक सहायता दिया करेगी। यह सहायता इन प्रांतों को इसलिए दी जाएगी कि इन प्रांतों को कुछ ऐसे कार्य करने होंगे, जिनका संबंध सारे राष्ट्र की समस्या से है। इसी तरह नए-नए प्रांतों का गठन हो सकता है। ऐसी दशा में संघीय सरकार उन्हें कुछ आर्थिक सहायता दिया करेगी, जिससे ये बने रह सकें।

अब आप अगर व्यय पक्ष पर मोटे तौर से देखें, जैसा कि मैंने स्पष्ट करने की कोशिश की है और उसकी तुलना राजस्व पक्ष से करें, जिसका प्रस्ताव इस उप-समिति की रिपोर्ट में किया गया है, तो यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं होगी कि संघ सरकार के लिए जिस वित्तीय प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है, वह इतनी ही है कि संघ सरकार सामान्य दिनों में सांस लेने के लिए पानी से ऊपर अपना सिर बाहर रख सके और शायद यह भी न हो सके। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि अगर कोई तूफान आएगा, तो उसमें यह डूब अवश्य जाएगी।

आइए, इस उप-समिति ने पैरा 21 में आपातकाल के बारे में, मुझे गंभीर आपातकाल कहना चाहिए, क्या प्रस्तावित किया है, उसे भी देखें। इस उप-समिति ने यह सुझाव